For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

पवन का:- दुख...

लड्डू बने,थालिया बजी
लड़कों के होने पर
घर घर मिठाइयाँ बंटी
घर खुशियों से और
चेहरा अकड़ से भर गया ...

चूल्‍हे चाहे ठंडे रहे
अपना पेट जला
इनका दिल ठंडा किया
फटी जेब की पेंट पहन
सब अरमानो को पूरा किया...

आँसुओं पर पहरा रक्खा
बच्चों की आँखो का रुख़ ना करें
इनकी तो खुश्क हो गयी
अपनी आँखों मे समंदर उतर गया ....

एक की आँखों मे दुख के आँसू
दूसरे बेटे की आँखों मे खून उतर गया
वसीयत इतनी हल्की निकली
बाप ना संभला
और नज़रों से उतर गया ....

ना जाने क्या कमी रह गयी
हमारी शिक्षा और संस्कारों मे
सारी आशाएँ झुर्रियाँ बनी
समय से पहले चेहरा भर गया ....


[मौलिक व अप्रकाशित]

Views: 424

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by वेदिका on March 4, 2013 at 8:30am

बहुत मार्मिक !

शुभकामनायें 

सादर 

Comment by pawan amba on March 4, 2013 at 6:39am

 Saurabh Pandey ji  aapke comnts mere liye prasaad ke samaan hai ....dhanywaad.....


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 4, 2013 at 12:26am

भाई पवनजी, एक बुजुर्ग के एकाकी दुख को साझा करने के लिए हार्दिक धन्यवाद.

Comment by pawan amba on March 3, 2013 at 11:44pm

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 3, 2013 at 5:56pm

बहुत मर्मस्पर्शी रचना..

मातापिता किस तरह बेटों के जन्म पर खुशियाँ मनाते हैं, अपनी ख्वाहिशों को रौंद बच्चों के सपने पूरे करते हैं... और अंततः वसीयत किस तरह उन्हें स्वार्थ से भर अजनबी कर देती है...उफ्फ्फ परवरिश में कहाँ कमी रह गयी...यह सवाल और कोइ जवाब नहीं.

इस दर्द को बाखूबी व्यक्त किया है आपने रचना में..

सुन्दर अभिव्यक्ति.

Comment by ram shiromani pathak on March 3, 2013 at 12:17pm

बड़ी  मार्मिक रचना है ! बधाई हो आदरणीय पवन  जी 

Comment by रविकर on March 3, 2013 at 11:44am

आभार आदरणीय-
बढ़िया प्रस्तुति ||

Comment by बृजेश नीरज on March 3, 2013 at 10:00am

सच लिखा आपने। प्रेम से ज्यादा अब वसीयत का मोल रह गया।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"चौपाई ****** करे मरम्मत चप्पल- जूते । चलता जीवन इसके बूते।।दोजून कभी खाता काके। और कभी हो जाते…"
1 hour ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"   आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब, सादर नमस्कार, प्रदत्त चित्र पर आपने सुन्दर…"
11 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"चौपाई * बन्द शटर हैं  खुला न ताला।। दृश्य सुबह का दिखे निराला।।   रूप  मनोहर …"
16 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"शुभ प्रभात,  आदरणीय! चौपाई छंद:  भेदभाव सच सदा न होता  वर्ग- भेद कभी सच न…"
21 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"चौपाई छंद +++++++++ करे मरम्मत जूते चप्पल। काम नित्य का यही आजकल॥ कटे फटे सब को सीता है। सदा…"
21 hours ago
Admin replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"स्वागतम"
yesterday
Admin posted discussions
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . घूस

दोहा सप्तक. . . . . घूसबिना कमीशन आजकल, कब होता है काम ।कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।।घास घूस…See More
Wednesday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . प्यार

दोहा सप्तक. . . . प्यारप्यार, प्यार से माँगता, केवल निश्छल प्यार ।आपस का विश्वास ही, इसका है आधार…See More
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई चेतन जी, उत्साहवर्धन व स्नेह के लिए आभार।"
Feb 15
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
Feb 15
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ.लक्ष्मणसिह धानी, 'मुसाफिर' साहब  खूबसूरत विषयान्तर ग़ज़ल हुई  ! हार्दिक …"
Feb 15

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service