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जवानी धर्म से भटके, हुआ वह शर्तिया "भटकल"

मौलिक
अप्रकाशित

लगा ले मीडिया अटकल, बढ़े टी आर पी चैनल ।
जरा आतंक फैलाओ, दिखाओ तो तनिक छल बल ।।

फटे बम लोग मर जाएँ, भुनायें चीख सारे दल ।
धमाके की खबर तो थी, कहे दिल्ली बताया कल ॥

हुआ है खून सादा जब, नहीं कोई दिखे खटमल ।
घुटाले रोज हो जाते, मिले कोई नहीं जिंदल ।।

कहीं दोषी बचें ना छल, अगर सत्ता करे बल-बल ।
नहीं आश्वस्त हो जाना, नहीं होनी कहीं हलचल ॥

जवानी धर्म से भटके, हुआ वह शर्तिया "भटकल" ।
मरे जब लोग मेले में, उड़ाओ रेल मत नक्सल ॥

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 25, 2013 at 10:38pm

सार्थक कटाक्ष करती हुई बहुत बढ़िया प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 24, 2013 at 6:55pm
आदरणीय रविकर जी!शब्द पर आपकी पकड़ के हम कायल हैं।और उतनी ही खूबसूरती के साथ आप कथ्य शिल्प का भी निर्वहन करते हैं,जो और भी काबिलेदाद है।

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 24, 2013 at 4:22pm

सामयिक रचना आदरणीय रविकर जी , बधाई स्वीकारें ।

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 24, 2013 at 4:05pm
सुन्दर व्यंग वर्तमान संदर में, हार्दिक बधाई रविकर जी - 
भले हो राजनेता सांसद या विधायक 
 हो फिल्म अभिनेता या खलनायक 
आजाद मुल्क में सब बोलने लायक 
डूबती लिटिया, नियुक्त हो जावे अवसायक 
डूबते को और डूबा -
 जब तलक शेष रहे कुछ भी खाने के लायक 
भटकल का भटकता पाँव है-
कभी हिन्दुस्तां तो कभी पाक में उन्नायक ।
खाने वाले खाकर होते मस्त मुछों के ताँव के लायक 
तुम कहों नालायक वे कहे ये है आँख पर बिठाने लायक 
Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on February 24, 2013 at 10:28am

जवानी धर्म से भटके, हुआ वह शर्तिया "भटकल" ।
मरे जब लोग मेले में, उड़ाओ रेल मत नक्सल ॥


सुन्दर अभिव्यक्ति.......

Comment by श्रीराम on February 24, 2013 at 7:46am

 क्या सुन्दर बात कही आपने....

हार्दिक बधाई।।।।।

Comment by बृजेश नीरज on February 23, 2013 at 7:56pm

वाह क्या बात है! बहुत सुन्दर!

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