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पापा की लाडली .... मीना पाठक

मै अपने पापा 

की  लाडली 
उनकी ऊँगली 
पकड़   कर 
मचलती इठलाती 
थोड़ी ही दूर चली थी 
कि 
काल चक्र ने 
एक झटके से 
उनके हाथ से 
मेरी ऊँगली छुड़ा दी
 
अब मैं अकेली 
इस निर्जन 
बियावान जंगल 
में 

इधर - उधर 

भटकती   हूँ

एक सुरक्षा भरी 
छाँव  के  लिए 
जहाँ  बैठ  कर
मैं अपने आप को 
सुरक्षित महसूस 
करूँ 

जैसे अपने पापा 
की ऊँगली पकड़ कर 
अपने आप को 
सुरक्षित महसूस 
करती थी 

मैं 

अपने पापा की 

लाडली ।
  • मीना 

(चित्र-गूगल)

मौलिक व अप्रकाशित 

Views: 1031

Comment

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Comment by Meena Pathak on February 22, 2013 at 12:22pm

आ. अजय यादव जी बहुत बहुत आभार 

Comment by Meena Pathak on February 22, 2013 at 12:20pm

बहुत बहुत धन्यवाद भरत भाई 

Comment by Meena Pathak on February 22, 2013 at 12:20pm

सादर आभार रेखा जोशी जी 

Comment by Meena Pathak on February 22, 2013 at 12:19pm

आदरणीय डा. अजय जी .. दिली आभार स्वीकार करें 

Comment by Meena Pathak on February 22, 2013 at 12:17pm

शुक्रिया उपासना सखी 

Comment by Meena Pathak on February 22, 2013 at 12:16pm

आदरणीय विजय निकोर जी ... सादर आभार 

Comment by Meena Pathak on February 22, 2013 at 12:15pm

आदरणीय ब्रजेश जी बहुत बहुत आभार 

Comment by Meena Pathak on February 22, 2013 at 12:13pm

प्रिय प्राची जी हार्दिक आभार .. 

Comment by Meena Pathak on February 22, 2013 at 12:08pm

सादर आभार राम शिरोमणि पाठक जी ...

Comment by upasna siag on February 21, 2013 at 10:29pm

bahut bhavukta purn rachna hai meena ji  mera bhi man bhar aaya.......

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