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कहो दर्द के देव तुम्‍हारे/चौबारे क्‍यों हमें डराय

कहो दर्द के देव तुम्‍हारे

चौबारे क्‍यों हमें डराय.. .

उदयाचल का

कोई जादू

कंगूरों पर

चल ना पाय

**कल जोड़े

भयभीत किरण भी

पल-पल काया

खोती जाय

पड़े तीलियों

के भी टोंटे

झूठे दीपक कौन जलाय ?

कहो दर्द के.....................

रोटी-बेटी

पर चिनगारी

रोज पुरोहित

ही रख आय

उलटा लटका

सुआ समय का

बड़े नुकीले

सुर में गाय

हर फाटक पर

जड़कर ताले

सन्‍नाटा खुलकर बतियाय  ?

कहो दर्द के.....................

कलश-फूल भी

सहमे-दुबके

ताल-मंजीरे

बज ना पाय

गलते भावों

की रसरी भी

विषम बोझ यह

सह ना पाय

बेफिक्री की

घास कट गई

शबनम अब किस पर इतराय  ?

कहो दर्द के.....................

अधर बिलखते

थाली पाकर

कौर कहां से

मुंह में जाय

हर चेहरे पर

धंसा मुहर्रम

सोलह आने

धमक डराय

गर्द बहुत

हमने थी झाड़ी

मन से **उख-बिख पर ना जाय  ?

कहो दर्द के.....................

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

संदर्भानुसार प्रयुक्‍त शब्‍द

**कल जोड़ना- हाथ जोड़ना, **उख-बिख- बेचैनी

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Comment

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Comment by Praveen Verma 'ViswaS' on January 30, 2013 at 5:33pm

भाव से परिपूर्ण रचना. बधाई.

Comment by vijay nikore on January 30, 2013 at 4:43pm

आदरणीय राजेश कुमार जी:

कलश-फूल भी

सहमे-दुबके

ताल-मंजीरे

बज ना पाय

...................................................

अधर बिलखते

थाली पाकर

कौर कहां से

मुंह में जाय

............................................

बहुत ही सुन्दर भाव पिरोय हैं आपने।

बधाई।

विजय निकोर

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