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शब्दों के भण्डार से, भरके मीठे बोल,
बेंचो घर-घर प्रेम से, दिल का ताला खोल,

नैनो से नैना मिले, बसे नयन में आप,
मधुर-मधुर एहसास का, छोड़ गए हो छाप,

मुख में ऐसे घुल गया, जैसे मीठा पान,
भाता सबको खूब है, दोहों का मिष्ठान,

मन में लागी है लगन, सीखन की है चाह,
धीरे-धीरे दिख रही, मुझको सच्ची राह,

बेटा जुग-जुग तुम जियो, जननी दे आशीष,
माता की पूजा करो, चरणों में रख शीश,

सुख-दुख करता ना दिखा, जात पात का भेद,
मानव से नफरत करो, नहीं सिखाता वेद.

("मौलिक व अप्रकाशित")

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Comment by अरुन 'अनन्त' on January 31, 2013 at 4:06pm

धन्यवाद अजय सर

Comment by Dr.Ajay Khare on January 31, 2013 at 4:05pm

dohe badia he badhai

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 31, 2013 at 4:04pm

आदरणीय लक्ष्मण सर आपका यह बहुत खूब सुखद है मेरे लिए. सादर

Comment by ram shiromani pathak on January 31, 2013 at 1:42pm

उत्तम रचना हार्दिक बधाई मित्र !!!!!!!!

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on January 31, 2013 at 1:33pm
मुख में ऐसे घुल गया, जैसे मीठा पान, 
भाता सबको खूब है, दोहों का मिष्ठान, ----बहुत खूब

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