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कल मर गया
किशनु का बूढा बैल,
अब क्या होगा...
कैसे होगा...
चिंतातुर,सोचता-विचारता
मन ही मन बिसूरता
थाली में पड़ी रोटी
टुकड़ों में तोड़ता
सोचता,,,बस सोचता...
बोहनी है सिर पर,
हल पर
गडाए नज़र,
एक ही बैल बचा...
हे प्रभु,
ये कैसी सज़ा...!!!
स्वयं को बैल के
रिक्तस्थान पे देखता..
मन-ही-मन देता तसल्ली
खुद से ही कहता,
मै ही करूँगा...हाँ मै ही करूँगा...
बैल ही तो हूँ मै,
जीवन भर ढोया बोझ,
इस हल का भी ढोऊंगा
कितनी भी विपत आये,
फसल अवश्य बोऊंगा...
छोड़ खात,मुह अँधेरे ही..
निकाल पड़ा खेत की ओर,
दो बैल जोत रहे खेत,
होने लगी देखो भोर.........

- रोली पाठक

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 22, 2011 at 3:59pm

इस सशक्त और यथार्थपरक रचना पर आपको शत्-शत् बधाइयाँ. आखिर की पंक्तियों ने तो जैसे अवाक् कर दिया है.

रोलीजी, आपकी रचनाधर्मिता पर मुग्ध हूँ. साधुवाद.

 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 3, 2010 at 6:50pm
रोली पाठक जी, आपकी यह रचना पढ़ कर मुंशी प्रेमचंद की कहानी और पात्र की याद आ रही है, बहुत ही खुबसूरत काव्य कृति है |
कुछ टंकण सम्बंधित त्रुटियाँ है जहा आपकी नजरेशानी की दरकार है जैसे बोहनी=बोवनी, छोड़ खात=छोड़ खाट,
बेहतरीन काव्य शिल्प के लिये बधाई |
Comment by आशीष यादव on November 3, 2010 at 6:42am
स्वयं को बैल के
रिक्तस्थान पे देखता..
मन-ही-मन देता तसल्ली
खुद से ही कहता,
मै ही करूँगा...हाँ मै ही करूँगा...
गरीब किसान की हालत को बखूबी बयां किया है आपने अपनी कविता में|

जीवन भर ढोया बोझ,
इस हल का भी ढोऊंगा
कितनी भी विपत आये,
फसल अवश्य बोऊंगा...
विपत्ति में लड़ने की हिम्मत देती हैं ये पंक्तियाँ
फसल अवश्य बोऊंगा...
छोड़ खात,मुह अँधेरे ही..
निकाल पड़ा खेत की ओर,
दो बैल जोत रहे खेत,
होने लगी देखो भोर.........
बहुत सुन्दर लगा पढ़कर|

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