For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

"ग़ज़ल" शाम अब ढलने लगी है या सबेरा हो गया

इक ग़ज़ल पेशेखिदमत है दोस्तों 

उड़ गयी चिड़िया सुनहरी क्या बसेरा हो गया
देखते ही देखते बाजों का डेरा हो गया

कुर्बतों में मिट गयी तहजीब की दीवार यूँ
आपका कहते थे जो अब तू औ तेरा हो गया

कागजी टुकड़े खुदा हैं और उनके नूर से
बंद हैं आँखें सभी हरसू अँधेरा हो गया

जुर्म भी होते न दिखता बेसदा है चीख भी 
क्या सड़क में इस कदर कोहरा घनेरा हो गया

पंछियों का शोर सुनके "दीप" अक्सर सोचता 
शाम अब ढलने लगी है या सबेरा हो गया 

संदीप पटेल "दीप"

Views: 661

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 24, 2012 at 4:33pm

आदरणीय अरुण अनंत भाई जी  सादर प्रणाम 
आपकी दाद पा कर मन प्रसन्नं हो उठा है ये स्नेह मुझे पर यूँ ही बनाये रखिये
आपका बहुत बहुत शुक्रिया सहित सादर आभार

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 24, 2012 at 4:32pm

आदरणीय वीनस सर जी सादर प्रणाम 
मेरे लिए आपकी दाद मिलना अर्थात ग़ज़ल मुकम्मल हो जाना है
सच कहूँ तो आपकी दाद के बाद मेरी ग़ज़ल अपने आप को सम्पूर्ण महसूस करने लगती है
ये स्नेह मुझ पर यों ही बनाये रखिये
आपका बहुत बहुत शुक्रिया सहित सादर आभार

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 24, 2012 at 4:30pm

आदरणीय गुरुदेव सौरभ सर जी सादर प्रणाम
गुरुवर आपने मेरी इस अदना सी ग़ज़ल पर जो कृपा दृष्टि डाली है उससे ग़ज़ल कहना सफल सा लग रहा है
अपना स्नेह और आशीष यूँ ही मुझ पर बनाये रखिये

और दादा आप निवेदन नहीं आज्ञा  दिया कीजिये
ऐसा कह कर मुझे जमीनी आदमी को आप और गर्क में भेज देते हैं लगता है जरुर मुझ से कोई अपराध हुआ है
यदि गलती से भी कुछ ऐसा हुआ हो तो मुझे क्षमा कर दें गुरुवर

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 24, 2012 at 4:26pm

 आदरणीया सीमा जी सादर प्रणाम
मेरी ग़ज़ल को आपकी दाद मिली सच कहूँ तो मन प्रसन्न हो गया और एक ऊर्जा भी आई और अच्छा करने की
आपका ह्रदय से धन्यवाद और सादर आभार 
स्नेह अनुज पर यों ही बनाए  रखिये

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 24, 2012 at 4:25pm

 आदरणीया महिमा जी सादर प्रणाम
आपने मेरी ग़ज़ल को सराहा और उत्साहवर्धन किया इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ
स्नेह अनुज पर यों ही बनाए  रखिये

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on December 23, 2012 at 10:10pm

जुर्म भी होते न दिखता बेसदा है चीख भी 
क्या सड़क में इस कदर कोहरा घनेरा हो गया 

पंछियों का शोर सुनके "दीप" अक्सर सोचता 
शाम अब ढलने लगी है या सबेरा हो गया  

भाई संदीप जी जवाब नही 

बधाई सादर 

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 23, 2012 at 11:52am

वाह मित्रवर लाजवाब ग़ज़ल कही है,मतला ही मन में घर कर गया, दिली दाद कुबूल करें.

Comment by वीनस केसरी on December 23, 2012 at 12:04am

उड़ गयी चिड़िया सुनहरी क्या बसेरा हो गया
देखते ही देखते बाजों का डेरा हो गया

कुर्बतों में मिट गयी तहजीब की दीवार यूँ
आपका कहते थे जो अब तू औ तेरा हो गया

वह भाई पूरी ग़ज़ल अच्छी बन पडी है
यह दो शेर विशेष रूप से पसंद आए
ग़ज़ल के लिए विशेष बधाई स्वीकारें


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 22, 2012 at 11:58pm

भाई संदीपजी,

आपने ग़ज़ल क्या कही बस दिल रख लिया ! मतला ऐसे मंजर को सामने रखता हुआ है जिसका आज के हालात से सीधा जुड़ाव दिखता है. इस ग़ज़ल के लिए दिल से शुक़्रिया.  बस ऐसे ही अपने कहे को साझा करते रहें. 

एक निवेदन : कोहरा को कुहरा कर लें भाई. भ्रम भी न रहे और शब्द भी ठीक है. यों, कुहरा और कोहरा दोनों चलता है.

Comment by seema agrawal on December 22, 2012 at 11:38pm

कुर्बतों में मिट गयी तहजीब की दीवार यूँ 
आपका कहते थे जो अब तू औ तेरा हो गया...वाह बहुत बढ़िया संदीप जी 

ग़ज़लों में आपकी कहन हमेशा एक ताज़गी लिए  हुए रहती है 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"स्वागतम"
32 minutes ago
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"  आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद' जी सादर नमस्कार, रास्तो पर तीरगी...ये वही रास्ते हैं जिन…"
9 hours ago
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
Tuesday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183

आदरणीय साहित्य प्रेमियो, जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। संयोग शृंगार पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Tuesday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

 अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।। प्रेम लोक की कल्पना,…See More
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
Feb 7
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Feb 6
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Feb 5
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Feb 5
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Feb 5
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Feb 4

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service