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"ग़ज़ल" शाम अब ढलने लगी है या सबेरा हो गया

इक ग़ज़ल पेशेखिदमत है दोस्तों 

उड़ गयी चिड़िया सुनहरी क्या बसेरा हो गया
देखते ही देखते बाजों का डेरा हो गया

कुर्बतों में मिट गयी तहजीब की दीवार यूँ
आपका कहते थे जो अब तू औ तेरा हो गया

कागजी टुकड़े खुदा हैं और उनके नूर से
बंद हैं आँखें सभी हरसू अँधेरा हो गया

जुर्म भी होते न दिखता बेसदा है चीख भी 
क्या सड़क में इस कदर कोहरा घनेरा हो गया

पंछियों का शोर सुनके "दीप" अक्सर सोचता 
शाम अब ढलने लगी है या सबेरा हो गया 

संदीप पटेल "दीप"

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Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 24, 2012 at 4:33pm

आदरणीय अरुण अनंत भाई जी  सादर प्रणाम 
आपकी दाद पा कर मन प्रसन्नं हो उठा है ये स्नेह मुझे पर यूँ ही बनाये रखिये
आपका बहुत बहुत शुक्रिया सहित सादर आभार

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 24, 2012 at 4:32pm

आदरणीय वीनस सर जी सादर प्रणाम 
मेरे लिए आपकी दाद मिलना अर्थात ग़ज़ल मुकम्मल हो जाना है
सच कहूँ तो आपकी दाद के बाद मेरी ग़ज़ल अपने आप को सम्पूर्ण महसूस करने लगती है
ये स्नेह मुझ पर यों ही बनाये रखिये
आपका बहुत बहुत शुक्रिया सहित सादर आभार

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 24, 2012 at 4:30pm

आदरणीय गुरुदेव सौरभ सर जी सादर प्रणाम
गुरुवर आपने मेरी इस अदना सी ग़ज़ल पर जो कृपा दृष्टि डाली है उससे ग़ज़ल कहना सफल सा लग रहा है
अपना स्नेह और आशीष यूँ ही मुझ पर बनाये रखिये

और दादा आप निवेदन नहीं आज्ञा  दिया कीजिये
ऐसा कह कर मुझे जमीनी आदमी को आप और गर्क में भेज देते हैं लगता है जरुर मुझ से कोई अपराध हुआ है
यदि गलती से भी कुछ ऐसा हुआ हो तो मुझे क्षमा कर दें गुरुवर

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 24, 2012 at 4:26pm

 आदरणीया सीमा जी सादर प्रणाम
मेरी ग़ज़ल को आपकी दाद मिली सच कहूँ तो मन प्रसन्न हो गया और एक ऊर्जा भी आई और अच्छा करने की
आपका ह्रदय से धन्यवाद और सादर आभार 
स्नेह अनुज पर यों ही बनाए  रखिये

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 24, 2012 at 4:25pm

 आदरणीया महिमा जी सादर प्रणाम
आपने मेरी ग़ज़ल को सराहा और उत्साहवर्धन किया इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ
स्नेह अनुज पर यों ही बनाए  रखिये

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on December 23, 2012 at 10:10pm

जुर्म भी होते न दिखता बेसदा है चीख भी 
क्या सड़क में इस कदर कोहरा घनेरा हो गया 

पंछियों का शोर सुनके "दीप" अक्सर सोचता 
शाम अब ढलने लगी है या सबेरा हो गया  

भाई संदीप जी जवाब नही 

बधाई सादर 

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 23, 2012 at 11:52am

वाह मित्रवर लाजवाब ग़ज़ल कही है,मतला ही मन में घर कर गया, दिली दाद कुबूल करें.

Comment by वीनस केसरी on December 23, 2012 at 12:04am

उड़ गयी चिड़िया सुनहरी क्या बसेरा हो गया
देखते ही देखते बाजों का डेरा हो गया

कुर्बतों में मिट गयी तहजीब की दीवार यूँ
आपका कहते थे जो अब तू औ तेरा हो गया

वह भाई पूरी ग़ज़ल अच्छी बन पडी है
यह दो शेर विशेष रूप से पसंद आए
ग़ज़ल के लिए विशेष बधाई स्वीकारें


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 22, 2012 at 11:58pm

भाई संदीपजी,

आपने ग़ज़ल क्या कही बस दिल रख लिया ! मतला ऐसे मंजर को सामने रखता हुआ है जिसका आज के हालात से सीधा जुड़ाव दिखता है. इस ग़ज़ल के लिए दिल से शुक़्रिया.  बस ऐसे ही अपने कहे को साझा करते रहें. 

एक निवेदन : कोहरा को कुहरा कर लें भाई. भ्रम भी न रहे और शब्द भी ठीक है. यों, कुहरा और कोहरा दोनों चलता है.

Comment by seema agrawal on December 22, 2012 at 11:38pm

कुर्बतों में मिट गयी तहजीब की दीवार यूँ 
आपका कहते थे जो अब तू औ तेरा हो गया...वाह बहुत बढ़िया संदीप जी 

ग़ज़लों में आपकी कहन हमेशा एक ताज़गी लिए  हुए रहती है 

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