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मेरा रस्‍ता रोक रही हैं/तेरी ही बातें अक्‍सर

कटु-मधु
कुछ भींगी यादें
लेकर आई
हर दुपहर
ढूंढा जब भी
नया ठिकाना
पहुंच गई
लेकर नश्‍तर

कमतर जिनको आंक रहे थे
कर गए आज मुझे बेघर

घुटने भर की
आशा लेकर
उड़ा विहग
जब भी खुलकर
काली स्‍याही
लेकर दौड़े
लिए पंख
धूसर-धूसर

हमने जिनको गले लगाया
कर गए वे जीना दूभर

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on December 25, 2012 at 7:58pm

आदरणीय राजेश कुमार झा जी बहुत सुन्दर भाव और प्रवाह. बधाई स्वीकारें.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 24, 2012 at 10:53am

कोमल कोमल भावों का सुन्दर शब्द चित्र...मुग्धकारी शब्द संयोजन के लिए बधाई 

Comment by MAHIMA SHREE on December 23, 2012 at 7:59pm

घुटने भर की
आशा लेकर
उड़ा विहग
जब भी खुलकर
काली स्‍याही
लेकर दौड़े
लिए पंख
धूसर-धूसर

क्या बात है ...सुंदर प्रस्तुति हमेशा की तरह ..बधाई स्वीकार करें


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 22, 2012 at 6:12pm

प्यास रह गयी और पानी ओरा गया.. . आपकी रचनाओं से अक्सर यही प्रतीत होता है.

आदरणीय राजेश झाजी, आपका पद्य-प्रयास झुमा देता है. बस, संभव हो तो थोड़ा और समय दीजिये. बधाई.

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 22, 2012 at 10:53am

आदरणीय राजेश जी बहुत ही सुन्दर गीत है सभी पंक्तियाँ उम्दा भाव लिए हुए हैं बधाई स्वीकारें

Comment by seema agrawal on December 21, 2012 at 8:15pm

घुटने भर की
आशा लेकर
उड़ा विहग
जब भी खुलकर
काली स्‍याही
लेकर दौड़े
लिए पंख
धूसर-धूसर....वाह बहुत सुन्दर पंक्तियाँ राजेश जी अच्छा गीत लय पर आपकी पकड़ बहुत अच्छी है 

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