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ग़ज़ल : आ मेरे पास तेरे लब पे जहर बाकी है

बहर : २१२२ ११२२ ११२२ २२ 

रह गया ठूँठ, कहाँ अब वो शजर बाकी है

अब तो शोलों को ही होनी ये खबर बाकी है

है चुभन तेज बड़ी, रो नहीं सकता फिर भी

मेरी आँखों में कहीं रेत का घर बाकी है

रात कुछ ओस क्या मरुथल में गिरी, अब दिन भर

आँधियाँ आग की कहती हैं कसर बाकी है

तेरी आँखों के समंदर में ही दम टूट गया

पार करना अभी जुल्फों का भँवर बाकी है

तू कहीं खुद भी न मर जाए सनम चाट इसे

आ मेरे पास तेरे लब पे जहर बाकी है

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Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on November 15, 2012 at 1:46am

धर्मेंद्र भाई ग़ज़ब की ग़ज़ल काही है आपने। बहुत उम्दा शेर निकाले हैं...खास कर इस शेर ने तो कमाल ही कर दिया....

तेरी आँखों के समंदर में ही दम टूट गया

पार करना अभी जुल्फों का भँवर बाकी है...माशाल्लाह 

दाद कुबूल करें !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 14, 2012 at 4:31pm

अच्छा है.. . मिल-बाँट कर लिखें-सुनें-कहें.. 

वर्ना ’मैंने लिखा-पढ़ा-कहा’ का अक्सर गुरूर आ जाता है.


:-)))))))

Comment by वीनस केसरी on November 14, 2012 at 4:25pm

आपका ही है हुज़ूर ...

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 14, 2012 at 4:20pm

वीनस जी, ये शे’र हमका दे दीजिए। वरना....
बहुत बहुत शुक्रिया मित्र

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 14, 2012 at 4:19pm

आदरणीय सौरभ जी, आपका यही दुलार तो लिखवाता है वरना हम क्या, कलम क्या।
बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 14, 2012 at 4:18pm

इमरान खान जी, शुक्रिया हुजूर

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 14, 2012 at 4:18pm

लक्ष्मण प्रसाद जी, बहुत बहुत धन्यवाद

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 14, 2012 at 4:17pm

फूल सिंह जी, बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by वीनस केसरी on November 14, 2012 at 2:19pm

वाह क्या कहने भाई
वाह वाह
यह शेर हासिले ग़ज़ल लगा

तेरी आँखों के समंदर में ही दम टूट गया

पार करना अभी जुल्फों का भँवर बाकी है


खाकसार का एक फिल्बदी शेर गौर फरमाएं

किसी दिन मैं भी बगावत पर उतर आऊँगा 
अभी मुझ पर तेरी बातों का सहर* बाकी है
* जादू


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 14, 2012 at 11:36am

मतला वाह ! कैसे ऐसा सोच लेते हो, धर्मेन्द्र भाई ? ईर्ष्या भी होती है, दुलार भी आता है. ग़ज़ब किया है आपने इस मतले में.

तेरी आँखों के समंदर में ही दम टूट गया
पार करना अभी जुल्फों का भँवर बाकी है .... ........    निसार !  ओह्होह ! ..  ग़ज़ब-ग़ज़ब-ग़ज़ब !

आखिरी शेर के सानी पर तो एकदम ही मार दिया.. .  अब क्या बधाई-दाद दूँ !

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