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चाहा था दिल ने जिसको वो दिलदार कब मिला
सब कुछ मिला जहाँ में मगर प्यार कब मिला

तनहा ही ते किये हैं ये पुरखार रास्ते
इस जीस्त के सफ़र में कोई यार कब मिला

बाज़ार से भी गुज़रे हैं हाथों में दिल लिए
लेकिन हमारे दिल को खरीदार कब मिला

उल्फत में जां भी हंस के लुटा देते हम मगर
हम को वफ़ा का कोई तलबगार कब मिला

तनहा ही लड़ रहा हूँ हालाते जीस्त से
हसरत को जिंदगी में मददगार कब मिला

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Comment by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on October 10, 2012 at 10:47pm

ji bahut bahut shukriya veenus ji

Comment by वीनस केसरी on October 10, 2012 at 2:30am

आय  हाय हसरत साहब आपने तो दिल बाग बाग कर दिया
क्या खूबसूरत अशआर से नवाजा है मंच को
माशाअल्लाह लाजवाब

Comment by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on October 10, 2012 at 12:45am

ji bahut bahut shukriya adarniye saurabh ji raj ji sandeep ji

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 9, 2012 at 1:06pm

वाह वाह साहब
बहुत शानदार ग़ज़ल कही है आपने
दाद क़ुबूल फरमाइए आदरणीय

Comment by राज़ नवादवी on October 8, 2012 at 2:12pm

बहुत खूब-

//तनहा ही लड़ रहा हूँ हालाते जीस्त से 
हसरत को जिंदगी में मददगार कब मिला//

हसरतें पूरी हुईं तो ख़त्म हुईं, दिल अब कितना खाली खाली है. बधाई हो भाई हसरत साहेब!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 8, 2012 at 12:34am

हसरत भाई, इस ग़ज़ल के लिये दाद पेश कर रहा हूँ ..

Comment by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on October 7, 2012 at 2:29pm

bahut bahut shukriyah rajesh kumari ji


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 7, 2012 at 11:07am

उल्फत में जां भी हंस के लुटा देते हम मगर
हम को वफ़ा का कोई तलबगार कब मिला ----गजब का शेर ---बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल कही है दाद कबूल करें शरीफ अहमद जी 

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