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मेरा विचार है,

डाक्टरी करके 
दवाखाना खोलने का
किन्तु सोचती हूँ 
जो किसी दिन 
आ पहुंचा इमांन 
अपने कटे हाथ को, 
रिसते खून  के साथ लेकर,
जो आ पहुँची इंसानीयत, 
अपने बांझपन के इलाज  के लिए
या सत्य,
 अपने शरीर पर कुंठा से बनी 
केंसर गाठे लिये,
सोचती हूँ तब क्या मैं सक्षम  हो पाऊँगी ?
बदलती दुनिया मैं उन्हें दवा दे पाऊँगी?

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Comment

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Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on May 6, 2012 at 12:39pm

सुन्दर रचना के लिए बधाई इति जी

Comment by Iti Sharma on May 6, 2012 at 12:32pm

धन्यवाद्  एवं आभार  आप सभी का 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 3, 2012 at 10:22am
अभिन्न दोस्त इति,
बहुत सुन्दर समसामयिक कविता... क्षत विक्षत  ईमान, बाँझ इंसानियत, और कुंठा ..... इनका इलाज काश डॉक्टर  कर पाते ....
इन मर्जों को तो समाज को खुद ही HEAL करना पड़ता है..
गहन भावों को समेटे इस व्याप्त सामाजिक विरूपता को दूर कैसे किया जाए...ये सोचने की तरफ इशारा करती इस काव्य कृति के लिए बधाई इति..
Comment by वीनस केसरी on May 2, 2012 at 11:23pm

यही यक्ष प्रश्न है सबके पास 
और यह प्रश्न भी किसी और से नहीं खुद से है
जवाब भी खुद ही खोजना है

सुन्दर रचना के लिए बधाई

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 2, 2012 at 2:16pm

aadarniya iti sharma ji, saadar

vastav main goodh prashn hai. sundar rachna hetu badhai.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 2, 2012 at 10:12am

बहुत ही गहरी बात, कह दी है, बिम्ब भले ही अलग है किन्तु परिणाम स्वरुप यह कविता बहुत कुछ कहने में सक्षम है, बधाई स्वीकार करें , इति शर्मा जी |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 1, 2012 at 3:51pm

अच्छा प्रयास है, बधाई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 1, 2012 at 1:05pm

अंतरात्मा से निकला हुआ प्रश्न ! मेडिकल प्रोफेशन   पर कटाक्ष ! उत्तर भी अंतरात्मा से ही मिलेगा .....बहुत विचारणीय रचना 

कृपया ध्यान दे...

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