For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

चेहरे के पीछे
चेहरे है
उन पे कसे नकाब
बड़े तगड़े है..
मीठे बोलो के भीतर
तीखेपन का खंजर है..
घावों पे मरहम तो है
पर दाग बने गहरे है
लोग बने मदारी है.. और
समझे हमे जमूरा
मतलब की यारी है और
जमकर सीनाजोरी है
संभल संभल के हँसना है और
नाप तोल के कहना
मन के दुखड़े खोले तो
कहते है रोना धोना
खुल के जीने का
दम भर लो कितना भी
पर बच बच के है रहना
दुनिया गर नाटक है तो
हम कब तक रहेगे एक्टर
कभी तो आने दो हमको
जो है हम
हम बन कर ....

Views: 566

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by MAHIMA SHREE on March 28, 2012 at 4:03pm
आदरणीया सीमा जी
सही कहा आपने " आज के दौर में हम बहुत कुछ हैं बस "हम" ही नहीं हैं .....एक अंतराल के बाद इस "हम" की तलाश भी मुश्किल हो जाती है"
क्योकि हम दुनियावी दिखावे में स्वय को कब खो चुके होते है पता नहीं चलता....और जिंदगी बीत चुकी होती है... आपकी बहुमूल्य प्रतिकिर्या के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद् .. साभार
Comment by MAHIMA SHREE on March 26, 2012 at 10:46am
नीरज सर हार्दिक आभार....
Comment by MAHIMA SHREE on March 15, 2012 at 5:40pm
नमस्कार चातक जी
आपका बहुत -२ धन्यवाद् ....आपको पसंद आई सराहा ...आभारी हूँ
Comment by Chaatak on March 14, 2012 at 10:52pm

महिमा जी, बहुत ही खूबसूरती से जीवन का फलसफा शब्दों मे पिरोया है आपने| हार्दिक बधाई!

Comment by MAHIMA SHREE on March 13, 2012 at 3:21pm
आदरणीया कुमारी जी
आपका हार्दिक धन्यवाद्... स्नेह बनाये रखे..

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 13, 2012 at 2:53pm

bahut sundar bhaav hain rachna me ...bahut khoob

Comment by MAHIMA SHREE on March 13, 2012 at 2:44pm
वाहिद साहब नमस्कार
आपका बहुत-२ धन्यवाद् ...मुझे आपलोगों की बातो का ध्यान है .....पर छंद में लिखने के नियम आप सबको ही बताना होगा....:)
Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 13, 2012 at 2:13pm

सदैव की भांति एक सुन्दर प्रस्तुति महिमा जी| समाज का व्यक्ति के प्रति नज़रिया बख़ूबी उभर कर सामने आया है| राकेश जी की बात पर भी थोड़ा ध्यान दीजियेगा| :-)

Comment by MAHIMA SHREE on March 13, 2012 at 1:04pm
आदरणीय योगराज सर...
आपकी आभारी हूँ...हर बार की तरह आपने मेरी रचना को सराहा है...उसे समझा ..स्नेह बनाये रखे..धन्यवाद्.

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on March 13, 2012 at 11:58am

अंतर्मन की की छटपटाहट को शब्दों में ढाल कर बहुत सुन्दर काव्य अभिव्यक्ति प्रस्तुत की है महिमा जी, बधाई स्वीकारें.

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आ. भाई सुशील जी , सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर दोहा मुक्तक रचित हुए हैं। हार्दिक बधाई। "
23 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय अजय गुप्ताअजेय जी, रूपमाला छंद में निबद्ध आपकी रचना का स्वागत है। आपने आम पाठक के लिए विधान…"
yesterday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय जी ।सृजन समृद्ध हुआ…"
yesterday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । आपका संशय और सुझाव उत्तम है । इसके लिए…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आयोजन में आपकी दूसरी प्रस्तुति का स्वागत है। हर दोहा आरंभ-अंत की…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आपने दोहा मुक्तक के माध्यम से शीर्षक को क्या ही खूब निभाया है ! एक-एक…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२ **** तीर्थ  जाना  हो  गया  है सैर जब भक्ति का हर भाव जाता तैर जब।१। * देवता…See More
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"अंत या आरंभ  --------------- ऋषि-मुनि, दरवेश ज्ञानी, कह गए सब संतहो गया आरंभ जिसका, है अटल…"
Saturday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा पंचक  . . . आरम्भ/अंत अंत सदा  आरम्भ का, देता कष्ट  अनेक ।हरती यही विडम्बना ,…"
Saturday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा मुक्तक. . . . . आदि-अन्त के मध्य में, चलती जीवन रेख ।साँसों के अभिलेख को, देख सके तो देख…"
Saturday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"नमस्ते, सुशील जी। आप से मिली सराहना बह्त सुखदायक है। आपका हार्दिक आभार।"
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा एकादश. . . . . पतंग

मकर संक्रांति के अवसर परदोहा एकादश   . . . . पतंगआवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग । बीच पतंगों के…See More
Wednesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service