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वो टूटा फिर से सितारा मोहब्बत की खातिर 

देख लो तुम भी नजारा मोहब्बत की खातिर 

आ जाओ तसव्वुर में घडी दो घडी 

ये वक़्त न मिलेगा दुबारा मोहब्बत की खातिर 

लोग तो इश्क में जीवन ही लुटा देते हैं 

दे  दो  बाँहों का सहारा मोहब्बत की खातिर

छूट गई है मेरे हाथों से पतंग की डोर

थाम लो इसका किनारा मोहब्बत की खातिर

खुशियों की ये दौलत मुझसे छीन ना लेना

ग़ुरबत में जीवन है गुजारा मोहब्बत की खातिर 

जाओ कोई उस आसमाँ की गर्द हटा दो 

चमकेगा वहीँ नाम हमारा मोहब्बत की खातिर  

          *****      

 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 22, 2012 at 9:26am

Saurabh ji tahe dil se shukria.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 22, 2012 at 9:11am

जाओ कोई उस आसमाँ की गर्द हटा दो
चमकेगा वहीँ नाम हमारा मोहब्बत की खातिर

पहली पंक्ति क्या ही सामयिक है ! आसमान गर्द से बुरी तरह भरा हुआ है.

 

राजेशकुमारीजी, आपकी भावदशा के प्रति मेरा सादर अभिनन्दन.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 22, 2012 at 7:38am

shukria Manoj ji.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 11, 2012 at 7:54am

hardik dhanyvaad Anand ji ..shukriya


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 11, 2012 at 7:53am

hardik aabhar Sandeep ji

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 10, 2012 at 6:58pm

माननीया,

अगर मुहब्बत की ख़ातिर इंसान हर काम करने लगे तो वैमनस्य का तो नामो निशाँ ही मिट जाएगा दुनिया से| सुन्दर रचना पर बधाई,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 9, 2012 at 5:36pm

आशुतोष जी हार्दिक धन्यवाद ,आभार आपका आपको मेरी ग़ज़ल पसंद आई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 9, 2012 at 5:34pm

हार्दिक आभार प्रदीप जी 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 9, 2012 at 4:26pm

जाओ कोई उस आसमाँ की गर्द हटा दो 

चमकेगा वहीँ नाम हमारा मोहब्बत की खातिर  

kya kahoon. nishabd, badhai 

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