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छत पे उगे जो चाँद निहारा न कीजिए

छत पे उगे जो चाँद निहारा न कीजिए
सूरजमुखी का दिन में नज़ारा न कीजिए

महफ़ूज़ रह न पायेगी आँखों की रौशनी
दीदार हुस्ने-बर्क़ खुदारा न कीजिए

शरमा के मुँह न फेर ले आईना, इसलिये
ज़ुल्फ़ों को आइने में संवारा न कीजिए

ऐसा न हो कि ख़ुद को भुला दें हुज़ूर आप
इतना भी अब ख़याल हमारा न कीजिए

एहसा किसी पे कर के, किसी को तमाम रात
ताने ख़ोदा के वासते मारा न कीजिए

दिल जिस से चौक जाये किसी राहगीर का
अब उसका नाम ले के पुकारा न कीजिए

वाइज़ नमाज़े-सुब्ह न हो जाए अब कज़ा
यूँ मैक़दे में रात गुज़ारा न कीजिए

‘अफ़सोस’ ज़िन्दगी में बज़ुज़ अपने आप के
भूले से भी किसी का सहारा न कीजिए

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 26, 2011 at 11:29pm

ऐसा न हो कि ख़ुद को भुला दें हुज़ूर आप
इतना भी अब ख़याल हमारा न कीजिए

वाह वाह गाजीपुरी से बहुत ही खुबसूरत ग़ज़ल की प्रस्तुति है, सभी शेर मखमली अंदाज में कहे गए है, मतला से मकता तक तारीफ़ के योग्य है दाद कुबूल करे | 

Comment by satish mapatpuri on November 26, 2011 at 6:57am

ऐसा न हो कि ख़ुद को भुला दें हुज़ूर आप
इतना भी अब ख़याल हमारा न कीजिए

सुभानअल्लाह................... खुबसूरत ख्याल ............
दाद कुबूल फरमाएं हुजुर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 26, 2011 at 12:25am

आदाब है आदरणीय अफ़सोस जी. पूरी ग़ज़ल रुमानियत और दुनियावी पेंचोखम से गुजरती नये मंजर दिखाती चलती है.

महफ़ूज़ रह न पायेगी आँखों की रौशनी
दीदार हुस्ने-बर्क़ खुदारा न कीजिए

वल्लाह, क्या ही सलाह है.

 

एहसा किसी पे कर के, किसी को तमाम रात
ताने ख़ोदा के वासते मारा न कीजिए

किस महीनी को इशारा कर बैठे हुज़ूर !! .. .वाह-वाह !!!

 

इससे पहले कि मक्ते पे दाद दूँ जिसमें आपने तमाम एहसास उड़ेल डाला है,  इस शे’र पर बधाई --

वाइज़ नमाज़े-सुब्ह न हो जाए अब कज़ा
यूँ मैक़दे में रात गुज़ारा न कीजिए.

 

इस बेदाग़ ग़ज़ल के लिये ढेरों दाद दे रहा हूँ, अफ़सोस साहब.

Comment by वीनस केसरी on November 25, 2011 at 11:32pm

बाकमाल अशआर के लिए ढेरो दाद कबूल करें

यह तीन शेर खास पसंद आये

महफ़ूज़ रह न पायेगी आँखों की रौशनी
दीदार हुस्ने-बर्क़ खुदारा न कीजिए

ऐसा न हो कि ख़ुद को भुला दें हुज़ूर आप
इतना भी अब ख़याल हमारा न कीजिए

वाइज़ नमाज़े-सुब्ह न हो जाए अब कज़ा
यूँ मैक़दे में रात गुज़ारा न कीजिए

Comment by आशीष यादव on November 25, 2011 at 10:30am

bahut hi achchhi lagi ye ghazal. sabhi she'r bahut achche lage.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on November 25, 2011 at 9:19am

बहुत खूबसूरत गज़ल| हर शेर पसंद आया और ये शेर बहुत पसंद आये |

 

महफ़ूज़ रह न पायेगी आँखों की रौशनी
दीदार हुस्ने-बर्क़ खुदारा न कीजिए

ऐसा न हो कि ख़ुद को भुला दें हुज़ूर आप
इतना भी अब ख़याल हमारा न कीजिए

वाइज़ नमाज़े-सुब्ह न हो जाए अब कज़ा
यूँ मैक़दे में रात गुज़ारा न कीजिए

ढेर सारी दाद कबूलिये|

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