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लघुकथा: गाँधी जयंती --संजीव 'सलिल'


लघुकथा:                     
गाँधी जयंती
संजीव 'सलिल'
*



  बापू आम आदमी के प्रतिनिधि थे। जब तक हर भारतीय को कपड़ा न मिले,
तब तक कपड़े न पहनने का संकल्प उनकी महानता का जीवंत उदाहरण है। वे 
हमारे प्रेरणास्रोत हैं’ 
   -नेताजी भाषण फटकारकर मंच से उतरकर अपनी महँगी आयातित कार में 
बैठने लगे तो एक पत्रकार ने उनसे कथनी-करनी में अन्तर का कारण पूछा।

नेताजी बोले– ‘बापू पराधीन भारत के नेता थे। उनका अधनंगापन पराये शासन में 

देश का दुर्दशा दर्शाता था, हम स्वतंत्र भारत केनेता हैं। अपने देश के जीवनस्तर की 
समृद्धि तथा सरकार की सफलता दिखाने के लिए हमें यह ऐश्वर्य भरा जीवन जीना 
होता है। हमारी कोशिश तो यह है कि हर जनप्रतिनिधि को अधिक से अधिक सुख-
सुविधाएँ दी जाएँ।’

‘चाहे जन प्रतिनिधियों की सुविधाएँ जुटाने में देश के जनगण का दीवाला निकल जाए? 

अभावों की आग में देश का जन सामान्य जलता रहे मगर नेता नीरो की तरह बाँसुरी 
बजाते ही रहेंगे- वह भी गांधी जैसे आदर्श नेता की आड़ में?’
–एक युवा पत्रकार बोल पड़ा।

अगले दिन से उसे सरकारी विज्ञापन मिलना बंद हो गया।

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 6, 2011 at 9:57am

अगले दिन से उसे सरकारी विज्ञापन मिलना बंद हो गया।......

 

नेताओं के साथ साथ मिडिया का भी पोल खोल के रख दिया है, सुन्दर लघुकथा, आभार आचार्य जी को |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 4, 2011 at 11:22pm

जिनके हाथों में जन के मार्गदर्शन तथा देशोन्नति का दायित्त्व हो, उनकी संवेदनहीनता सालती है. 

इस लघुकथा के लिये सादर धन्यवाद.

कृपया ध्यान दे...

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