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तन्हा तन्हा पाया

ग़ज़ल
تنهى تنهى بيا
तन्हा तन्हा पाया


न उसनें साथ निभाया
न इसने साथ निभाया
जब भी देखा दिल को अपनें
तन्हा तन्हा पाया
कहनें को तो सब थे अपनें
सब तो यही कहते थे
लेकिन जब भी मुड़कर देखा
साथ किसीको ना पाया
कद्र मेरे जज्वातों की
वोह क्या खाक करेंगे
जिनको मुहब्बत नफरत में
फर्क करना ना आया
कोन नहीं चाहता उनकी याद में
बनें ना यादगारें
हमनें अपनी यादों को
सबके दिल में बसाया
शुरू हो चुका ज़िन्दगी का
शायद आखरी दौर
अब क्या सोचना ज़िन्दगी में
क्या खोया क्या पाया
जलते रहे 'दीपक' की तरह
तखल्लुस रखा 'कुल्लुवी'
मुआफ कर चले उन सब को
जिस जिसनें हमें जलाया

'दीपक शर्मा कुल्लुवी'
091362411486
دبك شارما كلف

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Comment by Deepak Sharma Kuluvi on August 31, 2010 at 3:21pm
SHUKRIYA
Comment by Deepak Sharma Kuluvi on August 20, 2010 at 5:01pm
RANA JI THANKS FOR YOUR COMENTS,I AM A WRITER KYA LIKHATA RAHATA HOON MUJHE KHUD BHI NAHIM PATA,JO MAN KE BHAV HOTE HAIN LIKH DETA HOON,IN SE ANBHIGYA HOON .PL.BEAR WITH ME.

HOW AR YOU

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 19, 2010 at 8:32pm
रचना अच्छी है पर इसे ग़ज़ल कहना मुनासिब न होगा|

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 18, 2010 at 9:37pm
वाह दीपक भाई साहब वाह, बहुत सुंदर सरल शब्दों का प्रयोग कर बिलकुल हौले हौले सारी बातो को कह दिया,
रचना पढ़कर मंत्रमुग्ध हूँ, क्या कहूँ समझ न आया,
शब्दों की खूब बरसात हुई है भीगने से बच ना पाया,

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