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अन्तर्मन में तू रम जाये,

सांस सांस तेरा गुण गाये।

कण कण में तुझको मैं देखूँ,

नज़र पराया कोई न आये।

 

द्वेष न हो कोई भी मन में,

धर्मों  में अंतर  न  पायेँ।

यहां अज़ान आरती के स्वर,

आसमान में घुलमिल जायें।

 

इंसा को इंसान ही समझें,

धर्म जाति का भेद नहीं हो।

ईद मुबारक़  हिन्दू  बोलें,

मुस्लिम होलीरंग में तर हों।

 

भूखा कभी न सोए बचपन,

माँ तन  बेचे न  रोटी को। 

नहीं दिवाली जगमग होगी,

गर कुटिया तरसे दीपक को। 

 

बुद्धि दो, प्रभु सब पहचानें

अंश तेरा ही है कण कण में।

धरा स्वर्ग सम बन जाएगी,

भाव जगें ये गर जन जन में। 


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Comment by Kailash C Sharma on September 14, 2011 at 1:39pm

शुक्रिया वन्दना जी...

Comment by Kailash C Sharma on September 9, 2011 at 6:41pm

आभार मोहिनी जी।

Comment by mohinichordia on September 8, 2011 at 6:02pm

 ख़ूबसूरत सोच है आपकी  केलाश शर्मा जी |

कृपया ध्यान दे...

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