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मैं लिखना चाहती हूँ गीत 

तेरी प्रशंसा में, प्रकृति 

लेकिन तू तो स्वयं एक गीत है 

जीता जागता संगीत है 

लयबद्ध , तालबद्ध 

छंद है  ,गान है 

एक अनवरत अनचूक सिलसिला  है जीवन का |

तेरे मौसम से 

मेरे जीवन का अटूट रिश्ता है 

तेरा मेरा ये रिश्ता पुराना है, जन्मों का 

लगता है  मैं  तेरी ही बाँहों में खेली हूँ

 तेरे ही साथ जागी तेरे ही साथ सोयी हूँ 

तेरी ताल पर ही मेरे पैर  थिरके हैं 

तेरे सोंदर्य में ही मेरी आँखें खोई हैं  

तेरे ही नज़ारे मेरी नजर में बसे हैं 

तेरी ख़ुशी में मैं खुश हूँ 

तेरी उदासी मेरी है 

तेरी मुस्कराहट मेरी खिलखिलाहट

तेरी टूटन मेरी छटपटाहट है .

तू ही मेरी आकृति ,तू ही मेरा लिबास है 

तुझे पहनूं ,  ओढू  या बिछाउ,

तुझसे बातें करूँ ,

तुझे प्यार करूँ या 

तुझे बनाने वाले से , 

सुन्दर, अतिसुन्दर अभिव्यक्ति हे तू प्रकृति 

मेरे  सर्जनहार   की |

 

  • मोहिनी चोरडिया 

Views: 390

Comment

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Comment by Ambrish Singh Baghel on September 7, 2011 at 12:09pm
 बेहद ही खुबसूरत पंक्तियाँ..
Comment by Abhinav Arun on September 6, 2011 at 3:59pm

तू ही मेरी आकृति ,तू ही मेरा लिबास है 

तुझे पहनूं ,  ओढू  या बिछाउ,

तुझसे बातें करूँ ,

तुझे प्यार करूँ या 

तुझे बनाने वाले से , 

सुन्दर, अतिसुन्दर अभिव्यक्ति हे तू प्रकृति 

मेरे  सर्जनहार   की |

EK KAVI KE  DIL KI GAHRAION SE NIKLE BHAAV !! BEHATAREEN BAHUT BAHUT BADHAI !!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 4, 2011 at 7:57pm

प्रकृति की व्यापकता को सादर अनुमोदित करती नम्र रचना..

अनेकानेक शुभकामनाएँ


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 4, 2011 at 5:07pm

मोहिनी जी बहुत ही खुबसूरत रचना, मन के भों को आयाम दिया है आपने , बधाई आपको |

Comment by आशीष यादव on September 3, 2011 at 11:49pm

sundar kawita hetu badhai.

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