(एक)
२१२/२१२/२१२/२१२
जब अंधेरों के आंगन उजाले गये
न्याय के भी बदल रोज पाले गये।१।
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पांत से नीच कह जब निकाले गये
मस्जिदें उठ गयीं सब शिवाले गये।२।
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झूठ को ताज देकर जगत में सभी
सत्य दुत्कार घर से निकाले गये।३।
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यूं सियासत ने सपने दिखाये हमें
हाथ आये थे जो भी निवाले गये।४।
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क्या कहा सांकलों द्वार के कान में
चाबियां रह गयीं और ताले गये।५।
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होना आसान था ज़िन्दगी का सफर
साथ पांवों के अपने तो छाले गये।६।
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राह भटके नहीं फिर 'मुसाफिर' कहीं
दीप गौधूलि के रोज बाले गये।७।
(दो)
212/212/212/212
सोच जीवन रहा दोपहर देख लूं
मौत कहती हैं जीवन सफर देख लूं।१।
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आंखें रोती हैं बूढ़ी सहारा छिना
इस कयामत को कैसे ठहर देख लूंं।२।
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खाक होना है मुझको चमन के लिए
बस तुम्हारी दुआ का असर देख लूं।३।
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मैंने आंखों के सागर निचोड़े विवश
कैसे जलता हुआ एक नगर देख लूं।४।
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खाक होना है मुझको तो हो जाऊंगा
बस चमन को दुआ का असर देख लूं।५।
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जो बनाता महल सो के फुटपाथ पर
उसके हिस्से में भी एक घर देख लूँ।६।
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भाग्य ऐसा कहां मैं तुझे ऐ ! सनम
देवताओं सा होते अमर देख लूं।७।
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सब से चर्चे सुने तो कहा चांद ने
आज आंगन में उसके उतर देख लू।८।
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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
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