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अहसास की ग़ज़ल:मनोज अहसास :इस्लाह के लिए

2122 1122 1122 22
उठ के चल राह में तू मेरी उजाले कर दे
या कि चुपचाप मुझे मेरे हवाले कर दे

तुझको पीना है मेरा खून अभी मुद्दत तक
मेरे हिस्से में भी दो चार निवाले कर दे

अपनी तकदीर से ज्यादा तुझे शक है मुझपर
मेरे पीछे तू कईं देखने वाले कर दे

ये भी मुमकिन है बदल दे मुझे रस्तों का मिजाज़
ये भी मुमकिन है तेरे पाँवों में छाले कर दे

तोड़ डाला है हवाओं ने भरम मेरा तो
कहीं ये दौर तेरे हाथ न काले कर दे

मुझको मालूम है तू फिर से मुकर जाएगा
मेरी कश्ती को हवाओं के हवाले कर दे

छुप के बैठा हूँ मैं अपना यहाँ पे ग़म लेकर
मेरे मालिक गुफा के मुँह पे तू जाले कर दे

मौलिक और अप्रकाशित

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