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मतिमूढ़.. .

 

आज लगते ही तू लगता है चीखने

"आ ज़ाऽऽऽ दीऽऽऽऽऽऽऽऽ...."

घोंचू कहीं का.

मुट्ठियाँ भींच

भावावेष के अतिरेक में

चीखना कोई तुझसे सीखे .. मतिमूढ़ !

 …

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Added by Saurabh Pandey on August 15, 2012 at 11:30am — 43 Comments

फागुनी दोहे



फाग बड़ा चंचल करे, काया रचती रूप !

भाव-भावना-भेद को, फागुन-फागुन धूप !!



फगुनाई ऐसी चढ़ी,  टेसू धारें आग

दोहे तक तउआ रहे,  छेड़ें मन में फाग ॥



भइ, फागुन में उम्र भी करती जोरमजोर

फाग विदेही कर रहा, बासंती बरजोर !!…



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Added by Saurabh Pandey on February 29, 2012 at 7:30am — 21 Comments

फुलकी

(छंद - दुर्मिल सवैया)

जब मौसम कुंद हुआ अरु ठंड की पींग चढी, फहरे फुलकी

कटकाइ भरे दँत-पाँति कहै निमकी चटखार धरे फुलकी

तब जीभ बनी शहरी नलका, मुँह लार बहे, लहरे…

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Added by Saurabh Pandey on December 31, 2011 at 2:00pm — 58 Comments

दीप जले -- (छंद : मत्तगयंद सवैया और घनाक्षरी)

 

पाँति सजी मनभावन, पावन दीप जले,…

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Added by Saurabh Pandey on October 31, 2011 at 1:30pm — 2 Comments

जो बीते... तो बीत गये --- सौरभ

 

कंधे पर मेरे एक अज़ीब सा लिजलिजा चेहरा उग आया है.. .

गोया सलवटों पड़ी चादर पड़ी हो, जहाँ --

करवटें बदलती लाचारी टूट-टूट कर रोती रहती है चुपचाप.



निठल्ले आईने पर

सिर्फ़ धूल की परत ही नहीं होती.. भुतहा आवाज़ों की आड़ी-तिरछी लहरदार रेखाएँ भी होती हैं

जिन्हें स्मृतियों की चीटियों ने अपनी बे-थकी आवारग़ी में बना रखी होती हैं

उन चीटियों को इन आईनों पर चलने से कोई कभी रोक पाया है क्या आजतक?..

 …

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Added by Saurabh Pandey on October 15, 2011 at 9:30am — 20 Comments

जीवन-सार --- (छंद - घनाक्षरी) --- सौरभ

 

नाधिये जो कर्म पूर्व, अर्थ दे  अभूतपूर्व

साध के संसार-स्वर, सुख-सार साधिये ॥1॥

साधिये जी मातु-पिता, साधिये पड़ोस-नाता

जिन्दगी के आर-पार, घर-बार बाँधिये ॥2॥

बाँधिये भविष्य-भूत, वर्तमान,  पत्नि-पूत

धर्म-कर्म, सुख-दुख, भोग, अर्थ राँधिये ॥3॥

राँधिये आनन्द-प्रेम, आन-मान, वीतराग

मन में हो संयम, यों, बालपन नाधिये  ॥4॥

***************

हो धरा ये पूण्यभूमि, ओजसिक्त कर्मभूमि

विशुद्ध हो विचार से, हर व्यक्ति हो खरा  ||1||

हो खरा…

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Added by Saurabh Pandey on October 12, 2011 at 11:00pm — 18 Comments

ग़ज़ल - (तरही मुशायरा -15 में सम्मिलित)

 

ज़िन्दग़ी का रंग हर स्वीकार होना चाहिये

जोश हो, पर होश का आधार होना चाहिये ||1||



एक नादाँ आदतन खुशफहमियों में उड़ रहा

कह उसे, उड़ने में भी आचार होना…

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Added by Saurabh Pandey on October 10, 2011 at 9:46am — 11 Comments

कसौटी जिन्दगी की .. (छंद - हरिगीतिका)

यह सत्य निज अन्तःकरण का सत्त्व भासित ज्ञान है

मन का कसा जाना कसौटी पर मनस-उत्थान है

जो कुछ मिला है आज तक क्या है सुलभ बस होड़ से?

इस जिन्दगी की राह अद्भुत, प्रश्न हैं हर मोड़ से    ||1||…



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Added by Saurabh Pandey on October 4, 2011 at 1:30pm — 33 Comments

ग़ज़ल - भोगा हुआ यथार्थ..

.

जिसकी  रही  कभी नहीं आदत उड़ान की

अल्फ़ाज़ खूबियाँ कहें खुद उस ज़ुबान की

*

भोगा हुआ यथार्थ जो सुनाइये,  सुनें

सपनों भरी ज़ुबानियाँ  दिल की न जान की..

*

जिसके खयाल हरघड़ी परचम बने उड़ें

वो खा रहा समाज में इज़्ज़त-ईमान की ..

*

जिनके कहे हज़ारहा बाहर निकल पड़े

ऐसी जवान ताव से चाहत कमान की..

*

जबसे सुना कि शोर है अब इन्क़िलाब का

ये सोच खुश हुआ बढ़ी  कीमत दुकान की.

*

हर नाश से उबारता, भयमुक्त जो…

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Added by Saurabh Pandey on September 1, 2011 at 9:30am — 15 Comments

चीख सिलवटों की

निस्शब्द स्वरों के कानफोड़ू शोर

चिलचिलाते मौन की बेधती टीस

लगातार भींचती जाती दंत-पंक्तियों में घिर्री कसावट

माज़ी का गाहेबगाहे हल्लाबोल करते रहना..... ....

जब एकदम से सामान्य हो कर रह जाय.. 

तो फिर...

कागज़ के कँवारेपन को दाग़ न लगे भी तो कैसे?

आखिर जरिया भर है न बेचारा ..

/एक माध्यम भर../

कुछ अव्यक्त के निसार हो जाने भर का

महज़ एक जरिया ... ...और....

किसी जरिये की औकात आखिर होती ही क्या है ?

उसके…

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Added by Saurabh Pandey on June 24, 2011 at 8:09pm — 11 Comments

स्मृतियों के दरीचे से

स्मृतियों के अनगढ़ कमरे से

अचानक बाहर फुदक आयी हैं कुछ नम रोशनियाँ... /आज फिर.. ..

एक बार फिर

मासूम सी कोशिश की है इनने..

कि, मनाँगन में

कशिशभरी आवारा धूप बन लहर-लहर नाचेंगी..

 

तुम मेरे साथ हो न हो.... ..

इन रोशनियों के साथ जरूर होना.. ..

...............कोशिश तो करना.. ..

मुझे पता है .. गया समय उल्टे पाँव नहीं चलता..

किन्तु इन भोली-निर्दोष रोशनियों को अब कौन समझाये..

और देखो.. ..

तुम भी मत समझाना..…

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Added by Saurabh Pandey on June 24, 2011 at 7:30pm — 12 Comments

आओ साथी बात करें हम

आओ साथी बात करें हम

अहसासों की रंगोली से रिश्तों में जज़्बात भरें हम..

 

रिश्तों की क्यों हो परिभाषा

रिश्तों के उन्वान बने क्यों

हम मतवाला जीवनवाले

सम्बन्धों के नाम चुने क्यों

तुम हो, मैं हूँ, मिलजुल हम हैं, इतने से बारात करें हम..

आओ साथी बात करें हम.........

 

शोर भरी ख्वाहिश की बस्ती--

--की चीखों से क्या घबराना

कहाँ बदलती दुनिया कोई

उठना, गिरना, फिर जुट जाना

स्वर-संगम से अपने श्रम के, मन…

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Added by Saurabh Pandey on June 22, 2011 at 6:30pm — 18 Comments

हम ठगे जाते रहे हैं..

हम लुटे हैं

हम ठगे हैं.. और ये होता रहा है पुरातन-काल से..

हम ठगाते ही रहे हैं..

उन हाथों ठगे जिन्हें

प्रकृति-मनुज का क्रमान्तर बताना था

काल-मनवन्तर रचना और बनाना था

वर्ग-व्यवहार निभाना था..

हम ठगे गये उन आत्म-अन्वेषियों/खोजियों के हाथों

छोड़ गये जो पीछे बिलखता समुदाय, पूरा समाज

परन्तु यह वर्त्त न पा सका एक मुसलसल रिवाज़

फिर, हम फिर ठगे गये उनसे

जिन्होंने अपनी रीढ़हीन मूँछों और अपनी अश्लील ज़िद के आगे

पूरे राष्ट्र को रौंदवा दिया.. और धरवा… Continue

Added by Saurabh Pandey on June 6, 2011 at 1:20am — 6 Comments

जिजीविषा

नीरव-गुमसी चट्टानों पर

कटी-पिटी उभरी रेखाएँ

उन्मत्त काल का

हिंस्र वज्र-नख

जगह-जगह से नोंच गया है..।



अभिलाषा है कुछ विक्षिप्त

स्वप्न बच गए जूठे-जूठे

मसले थकुचे नुचे-चुथे से

स्वप्न बच गए जूठे-जूठे



धूसर उपलों की धूप तापती

विवश बिसुरती ध्वनि अकेली

अशक्त नव-जन्मी बाला-सी पसरी..

उठा सके बस भार श्वाँस का निश्चय का जी तोड़ परिश्रम..



कि,

मुँदी

उठी

झपकी

ठिठकी

रुक-ठहर

परख

तकती... .. तबतक… Continue

Added by Saurabh Pandey on October 28, 2010 at 6:00am — 3 Comments

मुखौटे

मुखौटे

हर तरफ मुखौटे..

इसके-उसके हर चहरे पर

चेहरों के अनुरूप

चेहरों से सटे

व्यक्तित्व से अँटे

ज़िन्दा.. ताज़ा.. छल के माकूल..।



मुखौटे जो अब नहीं दीखाते -

तीखे-लम्बे दाँत, या -

उलझे-बिखरे बाल, चौरस-भोथर होंठ

नहीं दीखती लोलुप जिह्वा

निरंतर षडयंत्र बुनता मन

उलझा लेने को वैचारिक जाल..

..... शैवाल.. शैवाल.. शैवाल..



तत्पर छल, ठगी तक निर्भय

आभासी रिश्तों का क्रय-विक्रय

होनी तक में अनबुझ व्यतिक्रम

अनहोनी का… Continue

Added by Saurabh Pandey on September 27, 2010 at 1:00pm — 2 Comments

क्या बोलूँ..

क्या बोलूँ अब क्या लगता है..

चाहत में घन-पुरवाई है
किन्तु, पहुँच ना सुनवाई है
मेघ घिरे फिर भी ना बरसे तो मौसम ये लगता है.. क्या बोलूँ अब क्या लगता है?!

आस भरा 'थप-थप' चलता था
’ताता-थइया’ उठ गिरता था
आज पिघलती सड़कों पर निरुपाय खड़ा है, लगता है.. क्या बोलूँ अब क्या लगता है?!

ओढ़ गंध बन-ठन जाने का
शोर बहुत है खिल जाने का
लद गई उन्मन डाली भी यों कि अँदेसा लगता है.. क्या बोलूँ अब क्या लगता है?

Added by Saurabh Pandey on August 18, 2010 at 6:00pm — 5 Comments

अंदाज़ नया

चल रही हो संग हरदम विडंबना बन सहचरी तो क्यों न देखें ज़िन्दग़ी को एक नया आयाम दे कर ।

स्वप्न बन कर रह गई हो नव उषा की लालिमा जो क्यों न अपने रक्त ही से देख लें अंजाम दे कर ॥



देख कर हँसता रहा है द्वेष औ’ गुमान से

इस जमाने की कहें क्या बाँधता व्यवधान से

बढ़ते कदम का हर फिसलना हो अगर संज्ञान से

दृष्टि हँसती तोड़ती-सी कह उठेगी देख कर फिर - थे सधे कितने कदम वो बढ़ते रहे मुकाम दे कर ॥



खेत की हरियालियों में बारुदों के बीज क्यों

शांति खातिर हैं जगह जो बौखलाती… Continue

Added by Saurabh Pandey on August 15, 2010 at 9:03pm — 2 Comments

पावस-गीत

.

नव-पावस के भीगे हम-तुम...

कुछ अनचीन्हे कुछ परिचित-से मृदुभावों में जीएँ हम-तुम।



इस भावोदय की वेला में चलो अलस की साँझ भुला दें

चाह रहे जो कहना अबतक आज जगत को चलो सुना दें

इच्छाएँ कह अपनी सारी जड़-चेतन झन्ना दें हम-तुम ॥ नव-पावस के भीगे हम-तुम...



अर्थ बने क्यों रुकने के अब, अलि तन्द्रिल हो क्यों उपवन में

गंध बँधे कब तक कलियों में, पवन रुके कब तक आँगन में

नीरस-चर्या सभी बदल कर नव-उल्लास गहें मिल हम-तुम ॥ नव-पावस के भीगे… Continue

Added by Saurabh Pandey on July 27, 2010 at 2:02pm — 6 Comments

परिचय

.

कोई किसी से परिचय नहीं कराता

समय के साथ-साथ स्वयं परिचित होता जाता है हर अजनबी

नहीं रहती कोई इकाई बंद अपने आप में फिर

कहीं कुछ बनने लगता है

कहीं कुछ जनमने लगता है चुपचाप



ऐसा नहीं

अँधेरे में भागता हर अभागा पलायनवादी ही हो

चकचकाती इस उजली धूप से

बच पाने की इच्छा भी हो सकती है

वर्ना देखो उसकी आँखें

लाल डोरे की जालियाँ कितनी उलझती गई हैं, और

उलझाती गई हैं उसकी जाने कितनी वेगवती संभावनाएँ



यदि तुम्हारा अभिजात्य

इस… Continue

Added by Saurabh Pandey on July 27, 2010 at 2:00pm — 7 Comments

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