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मैंने जितना तुमको जाना

मैंने जितना तुमको जाना
अपने मन को पढ़ कर जाना।
॰॰॰
यूँ भी तुमने कब चाहा था
मेरा मन यूँ तुमको चाहे,
रूप तुम्हारा पूजे प्रतिपल
फिर उस पूजन पे इतराए।
लेकिन अपनी सीमाओं में
मन कब सीमित हो पाया है,
पथ के सारे पाषाणों में
तेरी प्रतिमा गढ़ कर माना।
॰॰॰
मुझको ऐसा भान कहाँ था
भाव-दशा यूँ भी होती है,
उन पहरों में मन जागेगा
जिनमें रातें भी सोती हैं।
जग कहता था खेल नहीं है
यूँ पीड़ा से क्रीड़ा करना,
लेकिन मैंने इस पीड़ा को
पीड़ाओं में पड़ कर जाना।
॰॰॰
मैं कितना तुम्हें पुकारूँगा
गीतों का सहगामी होकर,
तुम भी कितना मौन रहोगे
अपनी परछाई में खोकर।
कभी स्वयं का पता पूछते
जब तुम मुझ तक आ पहुँचोगे,
तब जानोगे मैंने सचमुच
तुमको तुमसे बढ़ कर जाना।
॰॰॰
-मौलिक एवं अप्रकाशित
-18.06.2015

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Comment by Ravi Prakash on July 6, 2015 at 7:23pm
स्नेह,आशीर्वाद तथा परामर्श के लिए धन्यवाद आदरणीय। कृपया मार्गदर्शन करते रहें।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 6, 2015 at 3:50am

भाई रवि प्रकाश जी, एक अरसे बाद आपको पुनः मंच पर इस आत्मीय रचना के साथ देखना आनन्ददायक है. आपका यह गीत कोमल भाव-निवेदन के साथ प्रस्तुत हुआ है. इन पंक्तियो का असर देर तक बना रहता है. बहुत-बहुत शुभकामनाएँ.


एक बात:
भाईजी, आप ध्वन्यात्मक तुकान्तता से परहेज करें. यह शिल्पगत दोष की तरह लिया जाता है. जो इसके आग्रही हैं उनके प्रति यही कहा जा सकता है, कि तप का शॉर्टकट नहीं होता.
शुभेच्छाएँ.

Comment by Ravi Prakash on June 28, 2015 at 6:55pm
धन्यवाद आदरणीय।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on June 28, 2015 at 3:16am

आदरणीय रवि जी 

सुन्दर प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई 

Comment by Ravi Prakash on June 20, 2015 at 10:59pm
धन्यवाद आदरणीय।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 20, 2015 at 1:16pm

अच्छी रचना है . सादर .

कृपया ध्यान दे...

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