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क्यूँ आज फिर घेर रहे,सन्नाटे मुझे?
क्यूँ उठ रहे बवंडर,यादों के?
क्यूँ ले रहे गिरफ़्त में अपनी?
जिनसे दूर बहुत,निकल आई हूँ मैं,
जिन्हें दबा चुकी ,बहुत गहरा
अरमानों के कब्रिस्तान में,
क्यूँ जकड़ रहे फिर आज?
मानो कि यकीन हूँ ज़िंदा।
हूँ महज़ इक बुत,चलता-फिरता।
बेजान बेज़ार सी ज़िन्दगी हलचल से दूर,
ढो रही हूँ बोझ,जिस्म का,
चुका रही हूँ कर्ज,साँसों का।
क्यूँ दिखाता है खुदा ख्वाब?
कभी जो पूरे हो नही सकते ,
क्यूँ देता है फलने-फूलने,
फिर सूख कर मुर्झाने?
क्यूँ कर देता है इस कदर बेकरार
किसी एक की ख़ातिर,
जिसे खोना ही लिखा था,
तक़दीर में हमारी ?
टूटे हुए ख्वाबों की किरचें
चुभती हैं गहरे इतने
यादों का नश्तर
हर लम्हा मारता है,मौत हज़ार ,
हो चला है दर्द बर्दाश्त से बाहर।
जी चाहता है दे दूँ जान,
दीवारों से सर टकराकर।

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 7, 2015 at 9:59pm

जो कुछ यह रचना पढ़ रही है, आदरणीया ज्योत्सनाजी वह बड़ा ही भयावह है. क्लिष्ट संवेदना शाब्दिक हुई है.

एक बात मुझे आजतक समझ नहीं आयी, ’क्यों’ को क्यों ’क्यूँ’ लिखना चाहिये ?   क्या इससे भावनाओं की गहनता और सान्द्र होती है ?

प्रस्तुति हेतु हार्दिक शुभकामनाएँ.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 7, 2015 at 9:39pm

अरे नहीं बहन , जान मत दीजिये .

वह पथ् क्या  पथिक सफलता क्या जिस पथ पर  बिखरे शूल न हों

नाविक  की   धैर्य   परीक्षा  क्या  यदि   धाराएं    प्रतिकूल न  न  हों

Comment by jyotsna Kapil on May 6, 2015 at 5:57pm
आ.मिथलेश वामनकर जी आपकी इस हौसला अफ़ज़ाइ के लिए तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 6, 2015 at 5:14pm

दर्द की इन्तेहाँ हो गई है बयां 

खूब कविता लिखी हर्फ़ भी है रवां

पेशकश ये गज़ब की मुबारक कहें 

दिल को छू सा गया ये सुखन कारवाँ 

Comment by jyotsna Kapil on May 6, 2015 at 2:23pm
आपके सुन्दर अभिमत हेतु अंतस से आभारी हूँ आ.कृष्णा मिश्रा जी।
Comment by jyotsna Kapil on May 6, 2015 at 2:21pm
आपके उत्साह बढ़ने वाले शब्दों के लिए अत्यंत आभारी हूँ आ.श्याम नारायण वर्मा जी।मेरी त्रुटियाँ अवश्य बताएं।
Comment by jyotsna Kapil on May 6, 2015 at 2:19pm
आपके शब्दों ने मेरा उत्साह बहुत बढ़ाया है आ. डा.विजय शंकर जी।कभी-2 लिख लेती हूँ।कृपया मेरी कमियाँ अवश्य बताएं।
Comment by jyotsna Kapil on May 6, 2015 at 2:14pm
बहुत-2 आभारी हूँ आपकी आ.मनोज कुमार अहसास जी मेरा मनोबल बढ़ने हेतु।
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 6, 2015 at 10:00am

सुन्दर प्रस्तुति पर बधाई आदरणीया!ज्योत्स्ना जी!

Comment by Shyam Narain Verma on May 6, 2015 at 9:47am
बहुत सुन्दर और मार्मिक प्रस्तुति,
बधाई , इस प्रस्तुति पर , सादर।

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