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शब्द नहीं आते है ( कविता )

शब्द नहीं आते है

 

देख दुर्दशा   

सुन कर व्यथा

गूँजता करुण क्रंदन  

न पिघला मानव मन

कुछ कहने को शब्द नहीं आते है ....

लुट रही अस्मिता

मिट रहा सुहाग

छिन रहे माँओ के लाल

रक्तरंजित हो रही धरा

व्यथा सुनाने को शब्द नहीं आते है .......

जन्मांध न होकर भी जो

बन चुके धृतराष्ट्र

हलक तक शुष्क हो चला  

जिह्वा चिपक गई तालु से

पुकार लगाने को शब्द नहीं आते हैं ..........

द्रौपदी तब थी आज भी है

परंतु आज कृष्ण नहीं आते है

संवेदना हीन समाज

जगाने को राम नहीं आते है

क्या लिखूँ ...... शब्द नही आते है............

 

अन्नपूर्णा बाजपेई

 

अप्रकाशित एवं मौलिक

Views: 310

Comment

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Comment by annapurna bajpai on September 26, 2013 at 5:07pm

आदरणीय कुशवाहा जी आपका आभार । 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on September 26, 2013 at 3:55pm

वाकई में शब्द नहीं 

वाह, बधाई 

Comment by annapurna bajpai on September 2, 2013 at 2:24pm
आ० जितेंद्र जी हार्दिक धन्यवाद ।
Comment by annapurna bajpai on September 2, 2013 at 2:24pm
आ० केवल भाई जी आपका हार्दिक आभार ।
Comment by annapurna bajpai on September 2, 2013 at 2:16pm

 हार्दिक आभार आ0 गीतिका जी ।

 

Comment by annapurna bajpai on September 2, 2013 at 2:15pm
आ0 लक्ष्मण जी आपका हार्दिक आभार ।
Comment by annapurna bajpai on September 2, 2013 at 2:13pm
आ0 मीना जी आपका आभार ।
Comment by annapurna bajpai on September 2, 2013 at 12:50pm

आ० आदित्य जी आपका आभार ।

Comment by annapurna bajpai on September 2, 2013 at 12:48pm
आदरणीया विनीता जी आपका आभार ।
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 1, 2013 at 11:26pm

भावनाओं को व्यक्त करती अनुपम रचना, बहुत बहुत बधाई आदरणीया अन्नपूर्णा जी

कृपया ध्यान दे...

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