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"मोर्निंग वाक्"

मंद मंद रौशनी
शीतल पवन के झोंके
पंछियों की चहक
कलरव है या संगीत
वसुधा का अनूठा गीत
नदियों झीलों पोखरों में
बिखरा पड़ा है स्वर्ण
कमल के फूलों के इर्दगिर्द
कुमुदनी से अटखेलियाँ करती
चंचल किरणे
हरी हरी साखों में
कलि कलि
उंघती अंगडाइयां लेती
आँखें खोलती
खिल उठती है
भौंरे चूमते हैं
पुष्प को
झूमते हैं मंडराते हैं
इश्क ही इश्क है हर ओर
शबनम का चुम्बन
सब्ज घास के बिछौने पे
धरा तरुणाई सी जान पड़ती है
मुग्ध कर देती
मंदिरों की घंटियाँ
मस्जिदों की आजान
गुरद्वारे की वंदना
मदरसे की शालीनता
हे दिनकर
जब तुम भारत में 
मोर्निंग वाक् करते हो
अदभुत होती है
वो मोर्निंग
दिल गार्डेन गार्डेन हुआ जाता है

संदीप पटेल "दीप"

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Comment by ARVIND KUMAR TIWARI on August 11, 2012 at 6:39pm

वाकई दिल गार्डेन गार्डेन हो गया आपकी कृति पढकर हार्दिक बधाई

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 11, 2012 at 4:11pm

शबनम का चुम्बन 
सब्ज घास के बिछौने पे 
धरा तरुणाई सी जान पड़ती है 
मुग्ध कर देती 
मंदिरों की घंटियाँ 

प्रिय संदीप जी ...अनोखी कला हिंदी के सुप्रभात ..प्रभात वेला से शुरू ...गार्डेन गार्डेन पर अंत अच्छा लगा ....आइये हिंदी को और प्यार दें 
जय श्री कृष्ण ,...........कान्हा ने जैसे जन्माष्टमी में मन मोहा अब बड़े होते अपने कारनामे दिखाएँ पाप मिटायें  तो आनंद और आये ....
आप सब को कृष्ण जन्माष्टमी की , और स्वतंत्रता  दिवस (अग्रिम रूप से ) के उपलक्ष्य में ढेर सारी हार्दिक शुभ कामनाएं 
अजान, 
कली कली
अठखेलियाँ 
ऊंघती 
जय श्री राधे कृष्ण 
भ्रमर ५  

 

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