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खुले शहरों में मेरी मुस्कराहट अदा है।
बंद शहरों में हमारी अदा ही कजा है॥
खुले शहरों में भी खिलखिलाना मना है।
यही सवाल मेरा इसकी क्या वजा है॥
यूं तो मेरे चाम से मुहब्बत है सबको।
फिर छोटा सा ये क्यों मेरा आसमां है॥
यह तो मुझे बताओ दिल पे हाथ रखकर।
तेरे खुदा से बदतर क्या मेरा खुदा है॥
क्या उसी गुम खुदा की मैं कुदरत नहीं।
गर मेरा नहीं तो क्या तुम्हारा पता है॥
दोगली दुनिया से हम और क्या कहें।
हर सुबूत पेश फिर भी पूछता कहां है॥

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Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on August 31, 2012 at 8:31am
आभार लक्ष्मण जी
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 24, 2012 at 11:33am
यह तो बताओ दिल पे हाथ रखकर।
तेरे खुदा से बदतर क्या मेरा खुदा है॥
बहुत अच्छे, बही विन्ध्स्वारी त्रिपाठी जी 
-हार्दिक बधाई 
 

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