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कुछ दोहे श्रृंगार के --संजीव 'सलिल'

कुछ दोहे श्रृंगार के
संजीव 'सलिल'
*
गाल गुलाबी हो गये, नयन शराबी लाल.
उर-धड़कन जतला रही, स्वामिन हुई निहाल..

पुलक कपोलों पर लिखे, प्रणय-कथाएँ कौन?
मति रति-उन्मुख कर रहा, रति-पति रहकर मौन..

बौरा बौरा फिर रहे, गौरा लें आनंद.
लुका-छिपी का खेल भी, बना मिलन का छंद..

मिलन-विरह की भेंट है, आज वाह कल आह.
माँग रहे वर प्रिय-प्रिया, दैव न देना डाह..

नपने बौने हो गये, नाप न पाये चाह.
नहीं सके विस्तार लख, ऊँचाई या थाह..

आधार चाहते भाल पर, रखें निशानी एक.
तम-मन सिहरे पुलककर, सिर काँधे पर टेक..

कंधे से कंधे मिलें, नयन-हृदय मिल साथ.
दूरी सही न जा सके, मिले अधर-पग-हाथ..

करतल पर मेंहदी रची, चेहरा हुआ गुलाल.
याद किया प्रिय को हुई, मदिर नशीली चाल..

माटी से माटी मिले, जीवन पाये अर्थ.
माटी माटी में मिले, जग-जीवन हो व्यर्थ.

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Comment by AVINASH S BAGDE on February 6, 2012 at 6:59pm

पुलक कपोलों पर लिखे, प्रणय-कथाएँ कौन?

मति रति-उन्मुख कर रहा, रति-पति रहकर मौन..

.....दोहे का  जबाब नही...बधाई सलिल जी .

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on February 3, 2012 at 7:57pm

सलिल जी ,,छॊटॆ मुह बड़ी बात,,,,,,,वाह,,,,,,,,, के शिवाय कुछ नहीं  कह सकता,,,,,,,,,,,,कमाल ,,,बधाई,,,,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 2, 2012 at 11:49am

माटी से माटी मिले, जीवन पाये अर्थ.
माटी माटी में मिले, जग-जीवन हो व्यर्थ.

सभी दोहे एक से बढ़कर एक हैं इस दोहे का तो जबाब नही.

कृपया ध्यान दे...

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