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ग़ज़ल-जैसा जग है वैसा ही हो जाऊँ तो

बह्र-ए-मीर
पतझर में भी गीत बसंती गाऊँ तो
जैसा जग है वैसा ही हो जाऊँ तो

अंदर का अँधियारा क्या छट जायेगा
कोशिश करके बाहर दीप जलाऊँ तो

शायद लौट चले आएं रूठे पलछिन
फूलों से जो उनकी राह सजाऊँ तो

कार्य हमारे भी सारे सध जायेंगे
सुविधा शुल्क लिये ये हाथ बढ़ाऊँ तो

जग सारा देखेगा 'ब्रज' के पांव फटे
जो चादर के बाहर पग फैलाऊँ तो


(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Sunday

ग़ज़ल पे हौसलाफजाई के लिए शुक्रिया यादव जी...

Comment by आशीष यादव on August 26, 2020 at 1:32am

बहुत सुंदर गजल हुई है। काबिल-ए-तारीफ है। बधाई स्वीकार कीजिए।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 18, 2020 at 11:16pm

आदरणीय शर्मा जी बिलकुल सहमत हूँ...सुन्दर शब्दों के लिए आभार

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 18, 2020 at 11:15pm

आदरणीया मधु जी आपका हार्दिक अभिनन्दन वंदन...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 18, 2020 at 11:15pm

ग़ज़ल पे आपकी शिरक़त के लिये शुक्रिया आदरणीय समर जी..आपके बताये अनुसार सुधार करता हूँ..

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 18, 2020 at 11:13pm

सुन्दर शब्दों में उत्साहवर्धन के लिये हार्दिक आभार आदरणीय धामी जी...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 18, 2020 at 11:12pm

आदरणीय सुरेन्द्र जी ग़ज़ल पसंदगी के लिए शुक्रगुजार है...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 18, 2020 at 11:12pm

आदरणीय रवि जी रचना पटल पे आपकी उपस्थित के वंदनीय है..उत्साहवर्धन के लिए सादर आभार

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 18, 2020 at 9:00pm

आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी सादर नमस्कार 

बहुत सुंदर 

आदरणीय समर कबीर जी का सुझाव काबिले गौर है 

बधाई आपको 

Comment by Madhu Passi 'महक' on August 18, 2020 at 6:20pm

आदरणीय बृजेश कुमार' ब्रज ' जी नमस्कार! बहुत ही सुंदर ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें। 

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