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ग़ज़ल (अजय कुमार शर्मा)

सच कहता है शख्स वो ,भले बोलता कम है
बहुत सोचता है , भले वो लब खोलता कम है


कितनी भी हावी सियासत हो गयी हो आज भी
वो वादे निभाता तो नहीं , मगर तोड़ता कम है

कहीं जज़बात के रस्ते में कोई दुश्वारियां न हों
वो ख़त भी रखता है , तो लिफाफा मोड़ता कम है

मशीनी हो गयी है , रफ़्तार-ए -ज़िन्दगी , अब
आदमी हाँफता ज़िआदा , मगर दौड़ता कम है

फुटपाथों पे वो नंगे ज़िस्म सो रहा है , "अजय"
चीथड़े पहनता तो है वो , मगर ओढ़ता कम है

अजय कुमार शर्मा
मौलिक और अप्रकाशित
२३-०१-२०१४

Views: 507

Comment

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Comment by ajay sharma on January 27, 2014 at 9:55pm

सभी गुणीजन को सादर प्रणाम !
कोशिश तो कि थी किन्तु बह्र का अभ्यास नहीं कर पाया
आगे प्रयास करूंगा
यदि कोई त्रुटि हुयी हो तो क्षमा करेंगे

Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 27, 2014 at 4:48pm

कहीं जज़बात के रस्ते में कोई दुश्वारियां न हों 
वो ख़त भी रखता है , तो लिफाफा मोड़ता कम  यह शेर बेहद पसंद आया ..आपको तहे दिल बढ़ाई ..आदरणीय अरुण जी और गिरिराज की सलाह पर अमल जरूर कीजियेगा सादर बधाई के साथ 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 27, 2014 at 4:29pm

आ० अजय शर्मा जी 

कृपया इस ग़ज़ल की बह्र को भी साझा कर दें ...


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 24, 2014 at 5:28pm

आदरणीय अजय भाई , ग़ज़ल मे बातें बहुत अच्छी कही है आपने आपको बधाइयाँ ॥  लेकिन आपके शे र एक ही बह्र मे नही लग रहे है , आदरणीय अरुण की बातों को ज़रूर खयाल करें ॥

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 24, 2014 at 5:10pm

भाई अजय शर्मा जी कृपया ग़ज़ल की बह्र से अवगत करायें क्योंकि मतले में ही बह्र का निर्वाह नहीं हुआ है. दूसरी बात मतले में आपने (काफिया ओ लिया) और (रदीफ़ लता कम है) लिया दूसरे शेर में इसका निर्वाह नहीं हो रहा है देख लें. फिर चौथे शेर में काफिया औ लिया है आपने. आप इस मंच पर सक्रिय सदस्य हैं ग़ज़ल से सम्बंधित बहुत सामग्री मौजूद है पाठशाला में लाभ उठायें. काफी कुछ स्पष्ट हो जायेगा. सतत प्रयासरत रहें. सादर

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