For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

जब भगवान शिव ने सृष्टि की

जब चारों ओर केवल अन्धकार का अस्तित्व था, न सूर्य था न चन्द्रमा और न कहीं ग्रह-नक्षत्र या तारे थे, दिन एवं रात्रि का प्रादुर्भाव नहीं हुआ था, अग्नि, पृथ्वी, जल एवं वायु का भी कोई अस्तित्व नहीं था, तब एकमात्र भगवान शिव की ही सत्ता विद्यमान थी; और यह वह सत्ता थी जो अनादि एवं अनंत है।

एक बार भगवान शिव की इच्छा सृष्टि की रचना करने की हुई। उनकी एक से अनेक होने की इच्छा हुई। मन में ऐसे संकल्प के जन्म लेते ही भगवान शिव ने अपनी परा शक्ति अम्बिका को प्रकट किया। उन्होंने उनसे कहा, ‘‘हमें सृष्टि की रचना के लिए किसी दूसरे पुरुष का सृजन करना चाहिए, जिसके कन्धे पर सृष्टि-संचालन का भार सौंपकर हम मुक्त होकर आनन्दपूर्वक विचरण कर सकें।’’ ऐसा निश्चय करके भगवान शिव पुन: अम्बिका के साथ एकाएक हो गये और अपने वाम अंगों के दसवें भाग पर अमृत मल दिया।

इस प्रकार विष्णु की उत्तपत्ति हुई-एक दिव्य पुरुष, जिसका सौंदर्य अतुलनीय था। उनके चार हाथ थे। एक में शंख, एक में चक्र, एक में गदा तथा एक हाथ में पद्म सुशोभित हो रहा था।
भगवान शिव ने इस दिव्य पुरुष को विष्णु नाम दिया और उन्हें उत्तम तप करने का आदेश देते हुए कहा, ‘‘वत्स ! सम्पूर्ण सृष्टि के संचालन का उत्तरदायित्व मैं तुम्हें सौंपता हूं।’’ भगवान विष्णु कठोर तप के कारण उनके अंगों से असंख्य जल-धाराएं निकलने लगीं जिनसे सूना आकाश भर गया। अंतत: अपने कठोर तप के श्रम से क्लान्त होकर भगवान विष्णु ने उसी जल में शयन किया। जल अर्थात् ‘नार’ में शयन करने के कारण ही भगवान विष्णु का एक नाम नारायण हुआ।
कुछ समय पश्चात सोते हुए भगवान विष्णु की नाभि से निकलकर एक उत्तम कमल का पुष्प अस्तित्व में आया जिस पर उसी समय भगवान शिव ने अपने दाहिने अंग से चतुर्मुख ब्रह्मा को प्रकट करके डाल दिया। ब्रह्मा जी दीर्घ अवधि तक उस कमल के नाल में भ्रमण करते रहे, अपने उत्पत्तिकर्ता को ढूंढ़ते रहे, पर कोई लाभ नहीं हुआ। तब आकाशवाणी हुई, जिसके आदेशानुसार ब्रह्मा जी ने निरंतर बारह वर्षों तक कठोर तप किया।

बारहवें वर्ष की समाप्ति पर ब्रह्मा जी के समक्ष भगवान विष्णु प्रकट हुए। भगवान शिव की लीला से भगवान विष्णु एवं ब्रह्मा जी के मध्य अकारण विवाद छिड़ गया। विवाद चल ही रहा था कि दोनों के बीच एक दिव्य अग्निस्तम्भ प्रकट हुआ। भगवान विष्णु एवं ब्रह्मा जी अथक प्रयास करके भी अग्निस्तम्भ के आदि-अंत का पता नहीं लगा सके। अंत में हारकर भगवान विष्णु ने अपने दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना की, ‘‘महाप्रभो ! हम आपके स्वरूप को जान सकने में असमर्थ हैं। आप जो भी हो, हमारे ऊपर कृपा करें तथा प्रकट हों।’’

भगवान विष्णु की प्रार्थना सुनकर भगवान शिव प्रकट हो गये। उन्होंने कहा, ‘‘मैं तुम दोनों के कठोर तप और भक्ति से प्रसन्न हूं। ब्रह्मन् ! मैं समस्त सृष्टि का उत्तरदायित्व तुम्हें सौंपता हूं। विष्णु पर समस्त चराचर जगत् के पालन का उत्तरदायित्व होगा।’ इतना कहकर भगवान शिव ने अपने हृदयभाग से रुद्ध को प्रकट किया और उन्हें संहार का उत्तरदायित्व सौंपकर अंतर्धान हो गये।

ब्रह्मा जी ने अपने कार्य का आरम्भ मानसिक सृष्टि से किया, परन्तु जब उनकी मानसिक सृष्टि विस्तार नहीं पा सकी तो वे अत्यन्त दु:खी हो उठे। उसी समय आकाशवाणी हुई, जिसके माध्यम से उन्हें मैथुनी सृष्टि का आरम्भ करने का आदेश मिला। तब तक नारियों की उत्पत्ति नहीं हुई थी।

Views: 793

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Neelam Upadhyaya on July 12, 2010 at 12:44pm
Ji dhanyawaad. Yaha mujh se chook awashya huyi hai aur isake liye mai chhama prarthi hoo. Mai bhavishya mein is baat ka awashya dhyan rakhungi.
Comment by kiransinh chauhan on July 11, 2010 at 10:18pm
very nice
Comment by advocate mukund vyas on July 10, 2010 at 3:18pm
बहुत ही ज्ञान वर्धक बात बताई हे आपने ... धन्यवाद advocate mukund vyas 09314841958
Comment by Team Admin on July 10, 2010 at 12:31am
नीलम उपाध्याय जी जानकारी के लिए धन्यवाद..निम्नलिखित विषयों पर आपका ध्यानाकर्षण अपेक्षित है

(१) ओपन बुक ऑनलाइन नए और प्रतिष्ठित साहित्यकारों का एक अपना प्रगतिशील मंच है...जहां पर समय समय पर blogs के जरिये रोचक जानकारियों का भी स्वागत किया जाता है........
(२) आपने जो जानकारी आपने ब्लॉग के माध्यम से दी है वह कुंअर’ अनिल कुमार जी की पुस्तक "शिव पार्वती" का अंश है....जिसका बिना उनका नाम उधृत किये हुए अथवा बिना उनकी अनुमति के, कहीं भी, किसी भी तरह प्रकाशित करना copyright act का उल्लंघन होगा.
.
भविष्य में उपरोक्त बातों का ध्यान रखे

टीम एडमिन
OBO

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 10, 2010 at 12:26am
बहुत ही अध्यात्मिक बर्णन किया है दीदी , काफी ज्ञानबर्धक लेख है ,धन्यवाद,
Comment by Rash Bihari Ravi on July 9, 2010 at 4:39pm
श्री शिव चालीसा
***
दोहा
श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान ।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान ॥

जय गिरिजा पति दीन दयाला । सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके । कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये । मुण्डमाल तन छार लगाये ॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे । छवि को देख नाग मुनि मोहे ॥
मैना मातु की ह्वै दुलारी । बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी । करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे । सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ । या छवि को कहि जात न काऊ ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा । तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥
किया उपद्रव तारक भारी । देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥
तुरत षडानन आप पठायउ । लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई । सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥
किया तपहिं भागीरथ भारी । पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥
दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं । सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥
वेद नाम महिमा तव गाई । अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥
प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला । जरे सुरासुर भये विहाला ॥
कीन्ह दया तहँ करी सहाई । नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥
पूजन रामचंद्र जब कीन्हा । जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥
सहस कमल में हो रहे धारी । कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई । कमल नयन पूजन चहं सोई ॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर । भये प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥
जय जय जय अनंत अविनाशी । करत कृपा सब के घटवासी ॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै ॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो । यहि अवसर मोहि आन उबारो ॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो । संकट से मोहि आन उबारो ॥
मातु पिता भ्राता सब कोई । संकट में पूछत नहिं कोई ॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी । आय हरहु अब संकट भारी ॥
धन निर्धन को देत सदाहीं । जो कोई जांचे वो फल पाहीं ॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी । क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥
शंकर हो संकट के नाशन । मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं । नारद शारद शीश नवावैं ॥
नमो नमो जय नमो शिवाय । सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥
जो यह पाठ करे मन लाई । ता पार होत है शम्भु सहाई ॥
ॠनिया जो कोई हो अधिकारी । पाठ करे सो पावन हारी ॥
पुत्र हीन कर इच्छा कोई । निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे । ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा । तन नहीं ताके रहे कलेशा ॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे । शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥
जन्म जन्म के पाप नसावे । अन्तवास शिवपुर में पावे ॥
कहे अयोध्या आस तुम्हारी । जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥
॥ दोहा ॥
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश ॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण ॥
॥ इति शिव चालीसा ॥

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri posted a blog post

वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं

ग़ज़ल 2122  1212  22वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैकितने दुःख दर्द से भरा दिल हैये मेरा क्यूँ हुआ है…See More
13 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । हार्दिक आभार आदरणीय । फागोत्सव…"
yesterday
Nilesh Shevgaonkar and Dayaram Methani are now friends
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212   22 वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है कितने दुःख दर्द से भरा दिल…"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२***पीछे गयी  है  छूट  जो  होली  गुलाल की साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१। *…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"जय-जय सादर"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"बेटा,  व्तक्तिवाची नहीं"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय दयाराम जी, रचनाकार का काम रचनाएँ प्रस्तुत करना है। पाठक-श्रोता-समीक्षक रचनओं में अपनी…"
Saturday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आदरणीय सौरभ पांडेय जी, हर रचना से एक संदेश देने का प्रयास होता है। मुझे आपकी इस लघु कथा से कोई…"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी जी।  आप उन शब्दों या पंक्तियों को…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई। एक दो जगह टंकण त्रुतियाँ रह…"
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service