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बाल कविता: आन्या गुडिया प्यारी ---संजीव 'सलिल'

बाल कविता:

आन्या गुडिया प्यारी

संजीव 'सलिल'
*
*
आन्या गुडिया प्यारी,
सब बच्चों से न्यारी।

गुड्डा जो मन भाया,
उससे हाथ मिलाया।
हटा दिया मम्मी ने,
तब दिल था भर आया ।

आन्या रोई-मचली,
मम्मी थी कुछ पिघली।
नया खिलौना ले लो,
आन्या को समझाया ।

आन्या बात न माने,
मन में जिद थी ठाने ।
लगी बहाने आँसू,
सिर पर गगन उठाया ।

आये नानी-नाना,
किया न कोई बहाना ।
मम्मी को समझाया
गुड्डा वही मंगाया ।

मम्मी ने ले धागा ,
कार में गुड्डा टाँगा ।
आन्या झूमी-नाची,
गुड्डा भी मुस्काया ।

फिर महकी फुलवारी,
आन्या गुडिया प्यारी।
*******************

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 5, 2010 at 12:42pm
बहुत सुंदर बाल कविता लिखे है आचार्या जी, बाल मन यही तो है जब किसी पर आ गया तो समझाना मुश्किल, तभी तो बाल हठ पूरी दुनिया मे मशहूर है, मैया मैं तो चंद खिलौना लैहो ... कौन भूल सकता है इन पक्क्तियो को, बहुत ही प्यारी रचना है ,
Comment by विवेक मिश्र on July 5, 2010 at 9:34am
आपकी बाल कविता पढ़ते हुए यूँ ही कुछ याद आया और गुलज़ार साहब की पंक्तियाँ होठों पे आ गईं - "दिल तो बच्चा है जी..$$$; थोडा कच्चा है जी..$$$".. इस सुन्दर रचना के लिए आपको ढेर सारी बधाईयाँ.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on July 4, 2010 at 10:03am
श्रद्धेय आचार्य जी के चरणों में सादर प्रणाम..............

बहुत सुन्दर बाल कविता...साथ ही साथ निम्नलिखित पन्क्तियां एक सन्देश भी देती है

///आन्या रोई-मचली,
मम्मी थी कुछ पिघली।
नया खिलौना ले लो,
आन्या को समझाया ।

आन्या बात न माने,
मन में जिद थी ठाने ।
लगी बहाने आँसू,
सिर पर गगन उठाया ।////

और समाधान भी बताती है

आये नानी-नाना,
किया न कोई बहाना ।
मम्मी को समझाया
गुड्डा वही मंगाया ।////

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