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"फाॅर्मलिटी" /लघुकथा :अर्पणा शर्मा

"देखिये, मेरे फ्लैट की रजिस्ट्री की सारी रकम आपके बताए सर्विस प्रोवाइड़र के खाते में भिजवा दी गई है , आज रजिस्ट्री की आखिरी तारीख है और अभी तक  आपने मेरे पेपर तैयार नहीं किये",
 सुबह -शाम बिल्ड़र के ऑफिस के चक्कर लगा-लगा कर त्रस्त हुए जयेश ने अंततः लगभग गिड़गिड़ा कर उसके मैनेजर से कहा।

"देखिए मिस्टर जयेश रजिस्ट्री की बाकी फाॅर्मेलिटी आपने पूरी नहीं की, आप मेरे साथ को-ऑपरेट नहीं करेंगे तो कैसे चलेगा" ,
बिल्ड़र के मैनेजर ने नितांत सधे हुए और सर्वथा व्यावसायिक लहजे में जयेश को समझाया।

" पर फीस तो काम पूरा होने के बाद दी जाती है", जयेश हैरान कर बोला।

ऊबे हुए मैनेजर ने टालने के स्वर में कहा -
"आप समझने की कोशिश क्यों नहीं करते, ऐसे तो आपके पेपर कभी तैयार नहीं होपाऐंगे।"

हारकर जयेश ने वहीं एटीएम से मैनेजर की कही फीस के दस हजार कैश दिये और करीब एक घंटे में अपने फ्लैट के रजिस्ट्री कागज़ात हस्ताक्षर करके पंजीयन कार्यालय से निकल रहा था तो वहीं लगे पंजीयन शुल्क नोटिस बोर्ड पर उसकी नज़र अटक गई । एक जगह लिखा था -
"5 लाख से अधिक की संपत्ति के दस्तावेज के पंजीयन का शुल्क एक हजार रूपये "

अब जयेश के मन में फार्मेलिटी की परीभाषा और नौ हजार रूपयों का हिसाब गड़्ड़मगड़्ड़ होरहा था...!!!

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by Arpana Sharma on April 30, 2017 at 11:57pm
बहुत धन्यवाद आदरणीय श्रीमान् मनिंदर जी।
Comment by MANINDER SINGH on April 27, 2017 at 1:15pm

बहुत सुन्दर अपर्णा जी अपने लघु कथा लिखी है | भ्रष्टाचार से निपटने के लिए हम सभी को मिलकर प्रयास करना होगा तभी कुछ हो सकता है.......

Comment by Arpana Sharma on April 26, 2017 at 9:58pm
आदरणीया प्रतिभा जी - आपके प्रोत्साहन से मेरी लेखनी को संबल मिला , बहुत आभार ।
Comment by pratibha pande on April 26, 2017 at 8:40pm

भ्रष्टाचार  स्वयं  सजग होने से ही रुकेगा .  अच्छी लघु कथा , हार्दिक बधाई प्रिय अर्पणा  जी , अच्छा लिखती हैं आप 

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