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ग़ज़ल - हो सके तो ऐ ख़ुदा एहसान कर

2122 2122 212

मौत का मेरे नया फरमान कर ।
हो सके तो ऐ खुदा एहसान कर ।।

जिंदगी तो काट दी मुश्किल में, अब
रास्ता जन्नत का तो आसान कर ।।

जी रहा है आदमी किस्तों में अब ।
धड़कनो की बन्द यह दूकान कर ।।

टूट जाती हैं उमीदें सांस की।।
खत्म तू बाकी बचा अरमान कर ।।

हसरतें सब बेवफा सी हो गईं ।
आसुओं के दौर से अनजान कर ।।

हार जाता है यहां हर आदमी।
क्या करूँगा मौत को पहचान कर ।।

है गरीबी से मेरा रिश्ता बहुत ।
बेबसी का मत मेरी अपमान कर ।।

फूट कर वो रात भर रोता रहा ।
क्यूँ बहुत खामोश है सब जानकर ।।

जब अँधेरे ही मेरी किस्मत में हैं ।
रौशनी से मत खड़ा तूफ़ान कर ।।

-- नवीन
मौलिक अप्रकाशित

Views: 674

Comment

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Comment by Naveen Mani Tripathi on December 13, 2016 at 4:20pm
शुक्रिया भाई नरेंद्र जी
Comment by Naveen Mani Tripathi on December 13, 2016 at 4:19pm
शुक्रिया भाई राम आसरे जी।
Comment by Ram Ashery on December 13, 2016 at 4:09pm

बहुत ही सुंदर प्रस्तुति है आपको इसके लिए बहुत बहुत बधाई स्वीकार  हो 

Comment by narendrasinh chauhan on December 13, 2016 at 10:44am

सुन्दर रचना

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