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वह प्रीत की फसल उगाती है/ कविता

मेरा निश्छल मन
किसी से बैर
या शत्रुता नहीं
पालता है।

वह पालता है
प्रीत की सघनता को
वो बहता रहता है
भाव की अविचलता में
उसे फुरसत नहीं
प्रेम में बहते रहने से
उसकी दृष्टि हटती नहीं
अपने प्रियतम से।

हृदय की गहन तलहटी में
उनकी गुंजों में डूबी हुई
भोर की दूर्बा-सी
ओस को आँखों में सजाये
गुँथा करती है
प्रतिदिन जयमाल
मन के फूलों से।

कोकिल-सी कूक लिये
अंधकार को बेधा करती है

तरंगित मन के ज्वारों को
फुरसत नहीं मिलती
देखने की
दुनिया के जुआघर
और जुआरियों को।

चौपड़ों की चालों से इतर
वह मन मग्न
रात में भी भोर-सी
अंगराई लेती रहती है
वह जीवन की तान में
अपने मन की गान में
मग्न हो,खुद को बोती रहती है
सिर्फ प्रीत की फसल उगाती है
वह प्रीत की फसल उगाती है।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 3, 2016 at 10:08pm
बेहतरीन सृजन वन्दनीया काँता रॉय दीदी।सादर नमन लेखनी को!
Comment by Sushil Sarna on August 3, 2016 at 4:55pm

चौपड़ों की चालों से इतर
वह मन मग्न
रात में भी भोर-सी
अंगराई लेती रहती है
वह जीवन की तान में
अपने मन की गान में
मग्न हो,खुद को बोती रहती है
सिर्फ प्रीत की फसल उगाती है
वह प्रीत की फसल उगाती है।

वाह आदरणीय कान्ता रॉय जी अंतर्मन से सूक्ष्म भावों का बहुत ही सुंदर चित्रण किया है। दिल से हार्दिक बधाई स्वीकार करें इस अमुपम प्रस्तुति के लिए। अंगराई के स्थान पर शायद अंगड़ाई होना चाहिए। शायद ये टंकण त्रुटि है। कृपया अन्यथा न लेवें। धन्यवाद।

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