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चोचले (लघुकथा )राहिला

"देख जरा कैसी मशहूर होकर देश-विदेश में चर्चा का विषय बन गई अपनी शादी । और तो और पूरे दो लाख खर्च किये मालिक ने हमारी शादी पर।"
"हूंहsss...।"उसने बुरा सा मुंह बनाया ।
"क्यूं तुझे खुशी ना हो रही?तू टी.व्ही. पर आयेगी,अखबार में छपेगी ।"
"देखो..,अगर तुम ये सोचकर खुश हो रहे हो कि हमारी शादी हो जायेगी और मैं हमेशा के लिये खूंटा गाड़ कर सिर्फ तुमसे बंधी रहूंगी तो ये ख्याल अपने दिलोदिमाग से निकाल दो ।मैं इन इंसानो के चोचलों में अपनी आजादी, अपना जन्म सिद्ध अधिकार नहीं खो सकती । "
ऊंँटनी तुनक के ऊंट से बोली ।
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 19, 2016 at 9:07pm

हमारा समाज  जिसकी नींव  परिवार है  जिसके बल पर हम भारतीय होने का गर्व  करते है वह  इसलिये की यहाँ इंसानी चोचले में  नर और नारी दोनों एक दूसरे के प्रति समर्पित होते है . अगर यह इंसानी चोंचले न होते तो क्या हम किसी को पिता कह पाते . न रिश्ते होते न नाते न मानवीय सम्वेदनाएं . तब हम ऊँट होते या ऊंटनी    वीमेन लिब की सोच  इतनी भी आगे न बढे की नैतिकता  के मानदंड ध्वस्त हो जाये . पर ख्याल अपना अपना . सादर .

Comment by Rahila on May 19, 2016 at 4:21pm
बहुत शुक्रिया प्रिय दी! सादर नमन
Comment by Janki wahie on May 18, 2016 at 12:00pm
आज़ादी का मर्म महसूस कराती सुंदर कथा।बधाई प्रिय राहिला।

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