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तसव्वुफ़ का है आलम, जिंदगी रोने नहीं देती--(ग़ज़ल)-- मिथिलेश वामनकर

1222—1222—1222—1222

 

तसव्वुफ़ का है आलम, जिंदगी रोने नहीं देती

ये मैली-सी चदरिया मोह की धोने नहीं देती

 

दिखे जो नींद में यारो, वो सपने हो नहीं सकते

ये वो शै है......कभी जो आपको सोने नहीं देती

 

ख़ुशी आई है घर में तो पसे-गम भी यकीनन है

कभी साया अलग  खुद रौशनी होने नहीं देती

 

न करती फ़िक्र माज़ी की, न रखती हैं यकीं कल पे

सफल वो जिंदगी जो आज को खोने नहीं देती

 

तमन्नाओं के गुलशन में उगा लूं ख्व़ाब मैं लेकिन

मेरी गैरत की पथरीली जमीं बोने नहीं देती

 

कज़ा को आज समझा है बड़ी ही नेक दिल साहिब

बदी का बोझ बढ़ जाए तो ये ढोने नहीं देती

 

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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Comment by गिरिराज भंडारी on November 7, 2015 at 5:52pm

आदरणीय मिथिलेश भाई , बहुत सुन्दर गज़ल हुई है , दिल से बधाइयाँ स्वीकार करें , कुछ सलाह दे रहा हूँ , एक बार देख लीजियेगा , अगर सही लगे तो  ठीक , नही तो छोड़ दीजियेगा ॥

तसव्वुफ़ का है आलम, जिंदगी रोने नहीं देती   --    मतला अच्छा है , लेकिन - ये - की कमी लगती है

ये मैली-सी चदरिया मोह की धोने नहीं देती

 

दिखे जो नींद में यारो, वो सपने हो नहीं सकते

ये वो शै है......कभी जो आपको सोने नहीं देती  -- बहुत खूब -- बहुत सही बात कही

 

ख़ुशी आई है घर में तो पसे-गम भी यकीनन है   ---   आप जो कहना चाह रहे हैं, वो मै समझ रहा हूँ , पर मिसरा वो नही कह रहा है

                                                                    पसे गम -- ग़म के पीछे,   न कि गम भी पीछे है  ( सोचियेगा , मै भी सोच रहा हूँ )

कभी साया अलग  खुद रौशनी होने नहीं देती

ये शे र सही है फिर भी एक सलाह -

न करती फ़िक्र माज़ी की, न रखती हैं यकीं कल पे      --    करो मत फिक्र माजी की न फर्दा का यक़ीं रख्खो

सफल वो जिंदगी जो आज को खोने नहीं देती                  सफल है ज़िन्दगी जो आज को खोने नहीं देती

  

तमन्नाओं के गुलशन में उगा लूं ख्व़ाब मैं लेकिन

मेरी गैरत की पथरीली जमीं बोने नहीं देती   ---     लाजवाब ,


कज़ा को आज समझा है बड़ी ही नेक दिल साहिब   --   कज़ा को आज जाना है, कि है ये नेक दिल साहिब

बदी का बोझ बढ़ जाए तो ये ढोने नहीं देती 

Comment by Shyam Narain Verma on November 7, 2015 at 3:12pm

इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक सादर बधाई कबूल करें 

सादर।

Comment by amod shrivastav (bindouri) on November 7, 2015 at 2:20pm
क्या बात है आ मिथलेश सर बढ़Aई
Comment by Manan Kumar singh on November 7, 2015 at 10:34am
बढ़िय गजल आ.मिथिलेश जी,बधाई

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