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गजल
2212 2212 2212
कुछ कुछ उठा कर कब्र से लाया गया
बिसरा हुआ संगीत सुनवाया गया ।
मतदान की होते यहाँ पर घोषणा
फिर कुंद वह हथियार चमकाया गया।
देते रहे गाली परस्पर थे बहुत
मिलकर गले उनके लिपट जाया गया।
देते रहे थे घाव अबतक तो वही
फिर से सभी जख्मों को' धुलवाया गया।
कितने अपावन हो गये जो साथ थे
जो था अपावन नेह नहलाया गया।
हम-तुम हमेशा साथ थे आगे रहें
ऐसा अभी फरमान चिपकाया गया।
घर-घर लगायी आग सब सोये रहे
संपर्क कर फिर वर्ग दुहराया गया।
वैरी रहे होंगे कभी अब तो नहीं
चल भूलते जो अब रे' दफनाया गया।
कितना अभी पीछे रहाअपना वतन
हो याद कब झंडा था' फहराया गया।
कुछ हो भला पूरी अभी जन की रजा
देखें न कितना वक्त है जाया गया।
भर आ गया अपना गला किससे कहें
बेदर्द उनका गीत कब गाया गया?
'मौलिक व अप्रकाशित'@

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 7, 2015 at 11:08pm

सुझाव को सहर्ष मान देने के लिए आभार भाई मनन जी 

Comment by Manan Kumar singh on November 7, 2015 at 10:50pm
आदरणीया पढ़ें
Comment by Manan Kumar singh on November 7, 2015 at 10:49pm
आदरजय प्राचीजी शुक्रिया तथा सलाह बिलकुल मान्य है;परिमार्जन में आपका योगदान सराहनीय !

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 7, 2015 at 10:28pm

चुनावी राजनीति पर बढ़िया अशआर कहे हैं आ० मनन जी हार्दिक बधाई

पीछे पड़ा ...वतन के साथ उचित प्रतीत नहीं हो रहा ...पड़ा  के स्थान पर खड़ा या रहा किया जाए तो ?

एक बार पुनः इस सामयिक प्रस्तुति पर बहुत बहुत बधाई

Comment by Manan Kumar singh on November 5, 2015 at 11:15pm
आदरणीय बैजनाथ जी,शेर दर शेर विश्लेषण के लिए आपका बहुत बहुत आभार
Comment by Manan Kumar singh on November 5, 2015 at 11:09pm
आबिद भाई आभार आपका
Comment by Manan Kumar singh on November 5, 2015 at 11:00pm
आदरणीय सुशील जी,आभार आपका
Comment by Manan Kumar singh on November 5, 2015 at 10:58pm
आदरणीय गिरिराज भाई,प्रेरणा देने के लिए आपका बहुत बहुत आभार आपका
Comment by Manan Kumar singh on November 5, 2015 at 10:56pm
आदरणीय मिथिलेश जी,आभार
Comment by Abid ali mansoori on November 5, 2015 at 4:28pm

बहुत खूब आदरणीय मनन भाई!

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