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मित्रता की परिभाषा (लघुकथा)

काम से शहर आते वक्त धीरज ने मोतीचूर के लड्डू भी ले लिए अपने कमिश्नर हो चुके बचपन के मित्र नील के लिए । उत्साह भरे कदमों से जैसे ही बंगले में कदम रखा कि गार्ड ने रोक लिया । गार्ड के रोके जाने के बाद भी उसे उम्मीद थी कि उसका नाम सुनते ही नील दौड़ा आयेगा लेकिन गार्ड की नजरों के गहरे भाव नें मित्र की व्यस्तता की सूचना के साथ ही वो भ्रम भी तोड़ दिया। 
लड्डू के डिब्बे पर नजर गई तो वो सकुचा उठा ।गार्ड मानों उसे ताड़ चुका था ।
"साहब तो काजू कतली के सिवा कोई मिठाई नहीं खाते है । "
"ओह , लो भैया तुम ही रख लो । अपने बाल - बच्चों को खिला देना ।"
उसे मायूस कदमो से लौटते देख गार्ड बुदबुदाया
"अब दोस्ती के मायने बदल गए हैं-आज का कृष्ण अपने सुदामा के आने का संदेसा पाकर नंगे पाँव दौड़ा नहीं चला आता।"

.

( मौलिक एवम अप्रकाशित )
ज्योत्सना

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Comment by jyotsna Kapil on September 7, 2015 at 12:20pm
आ. गिरिराज भंडारी जी आज के रिश्ते आपकी सामाजिक स्थिति पर अधिक निर्भर करते हैं।आज कृष्ण किसी सुदामा के नहीं वरन किसी राज्याधीश के ही मित्र बनना अधिक पसन्द करेंगे।कथा को समय देने व सराहने के लिए हृदय से आभारी हूँ आपकी।
Comment by jyotsna Kapil on September 7, 2015 at 12:17pm
आ .मोहन बेगोवाल जी सचमुच आज के रिश्ते हैसियत देखकर निभाए जाते हैं।कथा को समय देबे एवम सराहने के लिए बहुत-2 आभार।
Comment by jyotsna Kapil on September 7, 2015 at 12:17pm
आ .मोहन बेगोवाल जी सचमुच आज के रिश्ते हैसियत देखकर निभाए जाते हैं।कथा को समय देबे एवम सराहने के लिए बहुत-2 आभार।
Comment by jyotsna Kapil on September 7, 2015 at 12:13pm
आ.कांता रॉय दी अपने कथा को अपना समय दिया एवम सराहना भी की तो महसूस हुआ की जैसे मेरा लेखन सफल हो गया।अन्तस् से आपकी आभारी हूँ।
Comment by jyotsna Kapil on September 7, 2015 at 12:03pm
आदरणीय प्रतिभा पांडे जी कथा को अपना कीमती समय देने व सराहने हेतु आपकी अति आभारी हूँ. 
Comment by jyotsna Kapil on September 7, 2015 at 11:58am
आदरणीय सौरभ पांडे जी कथा पर आने व सराहने हेतु सादर नमन एवं हृदयतल से आभार प्रेषित है. 
Comment by मोहन बेगोवाल on September 6, 2015 at 10:15pm

 आदरणीया ज्योत्सना जी ,हैसियत से साथ निभते  ये बात सच्च हो गई है , ऐसी लघुकथा के बधाई हो 

आदरणीया ज्योत्सना जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 6, 2015 at 9:08pm

दोस्ती जैसे रिश्ते की वर्तमान सच्चाई बयान करती आपको कथा के लिये आपको बधाई , आदरनीया  ज्योत्सना जी ।

Comment by kanta roy on September 6, 2015 at 6:48pm
बेहतरीन लघुकथा हुई है आदरणीया ज्योत्सना जी । आज के संदर्भ में ऐसी मित्रता ही अधिक देखने को मिलती है । निज हित ,निज सुख से परे इंसान अब कहाँ बाहर हो पाता है कभी । बधाई ।
Comment by pratibha pande on September 6, 2015 at 5:58pm

बहुत अच्छी लघु कथा हुई है ज्योत्स्ना जी ,बधाई आपको इस रचना के लिए 

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