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बटवारा ( लघुकथा)

बटवारा
“माँजी के सामान पर हम सब का बराबर अधिकार है.” सास की तेरहवीं के दिन ही बड़ी बहू ने कहना शुरू कर दिया. मझली ने भी हाँ में हाँ मिलाई. “हाँ हाँ क्यों नहीं भाभी वैसे भी हम अपने साथ कहाँ कुछ ले जा पाएंगे..” छोटे पुत्र अमर ने कहा तो पत्नी ने खा जाने वाली नज़रों से घूरा.अब तक जो आँगन मेहमानों से भरा था वो घर-गृहस्थी के सामान से भर गया.चांदी के गिलास-प्लेट,पीतल के कलश,बड़े-बड़े थाल, सब आँगन में सज गए. पुराने डिब्बों से लेकर दीवार घड़ियाँ बिस्तर सब छोटा बड़ा सामान आँगन में जुट गया था..
दस मिनट बाद मैदान खाली था. छोटे बेटे ने झुककर फर्श से कुछ उठाया तो दोनों बहुओं की सांस थम गई... “ये क्या है जो हमसे छूट गया.” कागज़ का टुकड़ा था..दादी के ज़माने की वो तस्वीर, जिस में माँ घूँघट में और तीनों भाई निक्कर में थे..
सीमा सिंह कानपुर
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा on August 16, 2015 at 9:15am

सीमा जी : लुप्त प्राय रिश्तों के दर्द को उकेर दिया आपने . अच्छा लगा ; सुरेन्द्र अरोड़ा 

Comment by Archana Tripathi on August 16, 2015 at 12:24am
अपनत्व की बची कशिश को दर्शाती सुंदर लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय सीमा जी
Comment by kanta roy on August 15, 2015 at 7:47am
बहुत ही सुंदर और सार्थक लघुकथा बनी है आपकी ये लघुकथा । बधाई स्वीकार कीजिये आदरणीया सीमा जी ।
Comment by Omprakash Kshatriya on August 14, 2015 at 7:28am

कभीकभी खोते सिक्के ही काम आते है . सुन्दर लघुकथा . बधाई. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 13, 2015 at 10:45pm

आदरणीया सीमा जी निराशा से मन को भर देती लघुकथा में अचानक पंचलाइन के रूप में आशा की किरण का आना सुखद रहा .... इस सुन्दर लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई 

Comment by pratibha pande on August 13, 2015 at 5:50pm

वाह सीमा जी ,जोड़ने और तोड़ने  के समीकरणों के बीच एक छोटा सा सुखद एहसास, बधाई आपको इस रचना के लिए   

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