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गज़ल........122, 122, 122, 122

 

तुम्हारी  कसम  बेसहारा  नहीं हूँ.

महज़ इक गज़ल हित आवारा नहीं हूँ.

 

सँवारे ज़मी आस्माँ चाँद तारें

वही इक जुगनू बेचारा नहीं हूँ.

 

गली घाट घर गाँव सबका सहारा

सजग कौम कुत्ता दुलारा नहीं हूँ.

 

लगी आग महलों दुमहलों में जब भी

बुझाया हमेशा लुकारा नहीं हूँ.

 

सकल जीव मे आत्मा एक सत्यम

सदा सच कहूं इक तुम्हारा नहीं हूँ.

 

के0पी0 सत्यम / मौलिक व अप्रकाशित

 

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Comment

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Comment by मनोज अहसास on August 20, 2015 at 11:53pm
बहुत बधाई सर
आपका गहन चिंतन शब्दों में समाहित नहीं हो पाया ऐसा मुझे लग रहा है
बात बहुत बड़ी रही है और शब्द समेटने का प्रयास कर रहे
बहुत बहुत बधाई
सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 20, 2015 at 11:12pm

ग़ज़ल का अभ्यास अच्छा लगा केवल प्रसादजी. आपकी ग़ज़ल पर बहुत ही सार्थक टिप्पणी आ. मिथिलेश भाई ने की है. आप लाभ ले सकते हैं.

शुभेच्छाएँ

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on August 5, 2015 at 7:36pm

इस प्रस्तुति पर बधाई आ० बड़े भाई केवल जी! बाकि बातें आदरणीय मिथलेश सर ने कह ही दी हैं!

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 5, 2015 at 6:44pm

आ0 वामनकर भाईजी,  सादर प्रणाम!  अगर आप बह्र के दृष्टि से देख रहे हैं,  तो सही है. है.कुत्ता और लुकारा भी  सही है. हां, यदि कहन की दृष्टि से कुछ गुंजायिश है तो वह आप सुधीजनो के हवाले मैं सदा ही सीखने को तत्पर हूं.  आपका तहेदिल से शुक्रिया, आभार. सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 5, 2015 at 11:43am

आदरणीय केवल जी, बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाएं.

आपकी बेहतरीन रचनाये पढ़ी है इसलिए इन कारणों से अशआर के मिसरा-ए-सानी से संतुष्ट नहीं हो पा रहा हूँ.

महज़ इक गज़ल हित आवारा नहीं हूँ........... बह्र के हवाले से 

वही इक जुगनू बेचारा नहीं हूँ...................बह्र के हवाले से 

सजग कौम कुत्ता दुलारा नहीं हूँ..................कुत्ता के प्रयोग से 

बुझाया हमेशा लुकारा नहीं हूँ................लुकारा के प्रयोग से 

हो सकता है मेरी समझ का फेर हो. पुनः बधाई ....सादर 

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