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एक ग़ज़ल - सुलभ अग्निहोत्री

सुरभि की छाँव में आकर हुआ दरपन सहज कायल
तुम्हारा रूप बादल सा इबादत की तरह निर्मल

नहाकर ओस से निकली प्रकृति की नायिका तड़के
उषा की बाँह फैलाये विमोहित रवि हुआ चंचल

न दो व्यवधान अलियों को उन्हें करने निवेदन दो
सुवासित प्रीति का उपवन, समर्पण के खिले शतदल

समूचा सींच डाला मन, बदन, अस्तित्व रिमझिम ने
तुम्हारी याद सावन सी बरसती हर घड़ी, हर पल

नदी की धार पर लिक्खा किसी ने गीत प्राणों का
बहा जब मन तरल होकर, लहर भी हो उठी विव्हल

नज़र की अंजुरियाँ भर-भर के अक्षय कोष लूटा है
बहारों बाँट दूँ हिस्सा, बिछाओ तो जरा आंचल

निगाहों ने लिखे मधुमास, इतराने लगा मौसम
समीरण ने पढ़ी पाती, हवा ने बाँध ली पायल


मौलिक एवं अप्रकाशित

-------- सुलभ अग्निहोत्री

Views: 718

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Comment by Sulabh Agnihotri on August 5, 2015 at 11:28am

बहुत-बहुत आभार आदरणीय दिनेश कुमार जी ! मातृभूमि के साथ-साथ मातृभाषा का भी ऋण है हमारे ऊपर, फिर जितनी सहज अभिव्यक्ति अपनी भाषा में संभव है उतनी ....

Comment by Sulabh Agnihotri on August 5, 2015 at 11:26am

बहुत-बहुत आभार आदरणीय krishna mishra 'jaan'gorakhpuri जी !

Comment by Sulabh Agnihotri on August 5, 2015 at 11:26am

बहुत-बहुत आभार आदरणीय Mohan Sethi 'इंतज़ार' जी !

Comment by Sulabh Agnihotri on August 5, 2015 at 11:25am

बहुत-बहुत आभार आदरणीय Saurabh Pandey जी ! ... आपकी ही प्रेरणा का सुफल है।

Comment by दिनेश कुमार on August 5, 2015 at 4:15am
आदरणीय सुलभ अग्निहोत्री जी, लाजवाब ग़ज़ल कही है। हिन्दी के शब्दों का प्रयोग चमत्कृत करता है। उच्च कोटि के विचार और बेहतरीन कहन है। इसके अलावा और क्या कहे कोई, वाह वाह वाह।
Comment by shree suneel on August 5, 2015 at 1:31am
आदरणीय सुलभ अग्निहोत्री जी, क्या कहने इस प्रस्तुति के... बहुत सुन्दर... मनमोहक... मन में उतरती...
'निगाहों ने लिखे मधुमास, इतराने लगा मौसम
समीरण ने पढ़ी पाती, हवा ने बाँध ली पायल... बहुत प्यारा.
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on August 4, 2015 at 7:50pm

नदी की धार पर लिक्खा किसी ने गीत प्राणों का
बहा जब मन तरल होकर, लहर भी हो उठी विव्हल

लाजव़ाब!हर शेर बेहतरीन! हार्दिक बधाई आ० सुलभ जी!

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on August 4, 2015 at 5:23pm

आदरणीय Sulabh Agnihotri जी बहुत लाजवाब शेर ....बधाई स्वीकार करें 

नहाकर ओस से निकली प्रकृति की नायिका तड़के
उषा की बाँह फैलाये विमोहित रवि हुआ चंचल


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 4, 2015 at 4:18pm

नज़र की अंजुरियाँ भर-भर के अक्षय कोष लूटा है
बहारों बाँट दूँ हिस्सा, बिछाओ तो जरा आंचल

हम पाठक प्रतीक्षित ’बहार’ हुए आपसे अपने हिस्से की आशा में बैठे ही हुए हैं. आपकी ग़ज़लों का हार्दिक स्वागत है, आदरणीय सुलभजी. 

हार्दिक बधाइयाँ और अशेष शुभकामनाएँ..

सादर

Comment by Sulabh Agnihotri on August 4, 2015 at 3:53pm

बहुत-बहुत आभार आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी। समर्थ लोगों की तारीफ उत्साहित करती है। बहरों का जहां तक सवाल हैं मैं तो बस रुक्न जानता हूं और उन रुक्नों को जिस क्रम में भी लगा कर गुनगुना सकता हूं वही मेरे लिए बहर है। ये इतने कठिन नाम तो मुझे याद होने से रहे, मैं तो चैपाइई आदि को भी बहर मान कर लिख डालता हूं।
एक बार पुनः आभार

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