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ग़ज़ल - तो मै इंसान होने से मुकरना चाहता हूँ ( गिरिराज भंडारी )

1222   1222   1222   122

क़रीब आ ज़िन्दगी, तुझको समझना चाहता हूँ

मैं ज़र्रा हूँ ,  तेरी बाहों में  फिरना चाहता हूँ

 

समेटा खूब , खुद को, पर बिखरता ही गया मैं

ग़ुबारों की तरह अब मैं बिखरना चाहता हूँ

 

जमा हर दर्द मेरा एक पत्थर हो गया है

ज़रा सी आँच दे , अब मैं पिघलना चाहता हूँ

 

तेरी आँखों मे देखी थी कभी तस्वीर खुद की

जमाना हो गया , मै फिर सँवरना चाहता हूँ

 

लगा के बातियाँ उम्मीद की ,दिल के दिये में

मैं सारी रात , तनहाई में जलना चाहता हूँ

 

सुना , चुभने लगा है अब उजाला भी किसी को

ख़ुदा हाफिज़ ! यहाँ से अब निकलना चाहता हूँ

 

बुना मेरे अहम ने जाल , मै ही फँस गया हूँ

तड़पता हूँ , कि मैं बाहर निकलना चाहता हूँ

 

अगर  इंसान कहते  हैं इन्हें, जो जी रहे हैं

तो  मै  इंसान  होने से  मुकरना  चाहता हूँ

******************************************

 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 12, 2015 at 4:56am

आ. मिथिलेश भाई , आभार आपका ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 12, 2015 at 12:31am

आदरणीय गिरिराज सर, बढ़िया ग़ज़ल हुई है, हार्दिक बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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