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मुक्तिका: हुआ सवेरा संजीव 'सलिल

मुक्तिका:

हुआ सवेरा

संजीव 'सलिल'

*

हुआ सवेरा मिली हाथ को आज कलम फिर.

भाषा शिल्प कथानक मिलकर पीट रहे सिर..

भाव भूमि पर नभ का छंद नगाड़ा पीटे.

बिम्ब दामिनी, लय की मेघ घटा आयी घिर..

बूँद प्रतीकों की, मुहावरों की फुहार है.

तत्सम-तद्भव पुष्प-पंखुरियाँ डूब रहीं तिर..

अलंकार की छटा मनोहर उषा-साँझ सी.

शतदल-शोभित सलिल-धार ज्यों सतत रही झिर..

राजनीति के कोल्हू में जननीति वृषभ क्यों?

बिन पाये प्रतिदान रहा बरसों से है पिर..

दाल दलेंगे छाती पर कब तक आतंकी?

रिश्वत खरपतवार रहेगी कब तक यूँ थिर..

*****

एक दृष्टि:

एक गेंद के पीछे दौड़ें ग्यारह-ग्यारह लोग.

एक अरब काम तज देखें, बड़ा भयानक रोग.

राम जी मुझे बचाना...

Acharya Sanjiv Salil

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 4, 2011 at 7:45pm

दाल दलेंगे छाती पर कब तक आतंकी?

रिश्वत खरपतवार रहेगी कब तक यूँ थिर..

 

जब तक अपनी माँ का सौदा करने वाले सौदागर होंगे , ये आतंकी मूंग दलते रहेंगे , सुंदर रचना आचार्य जी |

कृपया ध्यान दे...

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