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है कहाँ पहचान तेरी सादगी को क्या हुआ- शिज्जु शकूर

2122/ 2122/ 2122/212

है कहाँ पहचान तेरी सादगी को क्या हुआ

शोखियों को क्या हुआ तेरी हँसी को क्या हुआ

 

मुब्तला खुदगर्ज़ियों में हो गये जज़्बात सब

क्या कहूँ अब आजकल की दोस्ती को क्या हुआ

 

रास्ते भी थम गये हैं मंज़िलें भी खो गईं

रुक गई इक मोड़ पर ये ज़िन्दगी को क्या हुआ

 

अपनी हस्ती को मिटाता जा रहा है बेखिरद

किसको फुरसत सोचने की आदमी को क्या हुआ

 

सुब्ह पहले सी नहीं मौसम भी पहले सा नहीं

हो गई बोझिल हवायें ताज़गी को क्या हुआ

 

नर्मियाँ पहले सी अब तेरी शुआओं में नहीं

ये बता ऐ चाँद तेरी रौशनी को क्या हुआ

 

टूटती ही जा रही है डोर अब उम्मीद की

ये नहीं मालूम मेरी पुख़्तगी को क्या हुआ

(मौलिक व अप्रकाशित)

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 17, 2015 at 2:38pm

आदरणीय डॉ आशुतोष सर आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 17, 2015 at 2:37pm

आदरणीय मोहन सेठीजी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 17, 2015 at 2:36pm

आदरणीय निलेश भैया आपका हार्दिक आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 17, 2015 at 2:35pm

आदरणीय मिथिलेश भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया। ग़ज़लें तो आप भी कमाल की कहते हैं


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 17, 2015 at 2:33pm

आदरणीय विजय शंकर जी आपका हार्दिक आभार जो आपने मेरी रचना को समय दिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 17, 2015 at 2:32pm

जनाब समर कबीर साहब आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 17, 2015 at 2:30pm

आदरणीय श्याम नारायण जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by वीनस केसरी on May 16, 2015 at 1:28am

शिज्जु जी बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है ,......दाद क़ुबूल फरमाएं

Comment by Nirmal Nadeem on May 13, 2015 at 9:13pm
बहुत खूब ग़ज़ल हुई है। साहब क्या कहने। मुबारक हो। दिली दाद
Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 13, 2015 at 8:58pm

आ0 शिज्जू भाई जी, शानदार गज़ल हुई है. दिली दाद कुबूल करे. सादर

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