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इंसानियत का रिश्ता

लड़का रोज शाम को कानो में लीड लगाकर सड़क के बीचो बीच बने पार्क में वाकिंग करने पहुंच जाता.! और वो बुजुर्ग दम्पति भी रोज शाम को पार्क के बीचो बीच बने बेन्च पे बैठकर घंटो खेलते हुए बच्चो को एक टक निहारते.! कभी -कभी प्यार से बच्चो को पुचकार भी देते तो कभी थपकियाँ देने के बहाने सहला भर लेते.! ऐसा करके उन्हें एक अलग सा सुकून मिलता था ! लड़का भी पार्क के एक कोने में बैठकर हर पल उन बूढी आँखों में एक ख़ुशी की चमक देख खुश भर हो जाता..! हर रोज वो लड़का सोचता आज मै इनसे बात करुगा, पर किस बारे में उनसे मेरा रिश्ता ही क्या है..? कही ना कर दे तो..? इसी उधेड़बुन में लड़का लगा रहा ! आज सुबह से ही लड़के को कुछ अजीब सा लग रहा था, वो शाम होने का बेसब्री से इंतजार करने लगा.! शाम होते ही दौड़ते हुए वो पार्क पहुंच गया, पर ये क्या पार्क में तो कोई नहीं था..! पार्क के माली से पूछा तो पता चला " कोई बुजुर्ग मर गया है, इस मुहल्ले में इसलिए लोग पार्क नहीं आये.. लड़का दौड़ते हुए मुहल्ले में पंहुचा देखा भारी भीड़ लगी थी, लोग रो रहे थे ! बच्चे जो दादा कहकर खुश होते,वो उदास थे..! लड़का अवाक खड़ा हो सोचता रहा इंसानियत आज भी जिन्दा है..! - जीतू मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Saurabh Pandey on May 14, 2015 at 11:48pm

सुहृदय कथा

हार्दिक बधाइयाँ जितेन्द्र जी

Comment by VIRENDER VEER MEHTA on May 11, 2015 at 5:21pm

सार्थक और सुन्दर कथा आदरणीय जीतेंदर जी.... ..सादर बधाई !

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 11, 2015 at 9:45am

सच  है  इंसानियत  किसी कोनें में आज भी ज़िंदा  है तभी यह संसार  चल रहा  है | सार्थक लघु कथा के लिए बहाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 11, 2015 at 9:40am

आदरणीय जितेन्द्र जी बहुत अच्छी लघुकथा है हार्दिक बधाई 

Comment by विनय कुमार on May 10, 2015 at 9:32pm

सुन्दर लघुकथा के लिए बधाई आदरणीय जीतेन्द्र उपाध्याय जी ..

Comment by Jitendra Upadhyay on May 10, 2015 at 4:55pm

Sadar Aabhar Manoj sir ji

Comment by Manoj kumar Ahsaas on May 10, 2015 at 9:57am
अच्छी और सफल रचना

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