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1212 1122 1212 112/22

गई तो रंग बदलता ये शह्र छोड़ गई

घटा बहारों में ढलता ये शह्र छोड़ गई

 

सबा चमन से गुज़रते हुये महक लेकर

रविश-रविश* यूँ टहलता ये शह्र छोड़ गई                                    *बाग़ के बीच की पगडण्डी          

 

फ़िज़ा ए शह्र तलक आके यक-ब-यक आँधी

यूँ मस्तियों में उछलता ये शह्र छोड़ गई

 

तमाम रात भटकती वो तीरगी* आखिर                                        *अँधेरा

पिघलती शम्अ पिघलता ये शह्र छोड़ गई

 

रहे हयात में तर्जे हयात* देख बदी                                              *जीने का ढंग

हुदूदे डर से* निकलता ये शह्र छोड़ गई                                        *डर की सीमाओं से

 

-मौलिक व अप्रकाशित

 

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Comment by मिथिलेश वामनकर on April 4, 2015 at 12:51am

आदरणीय शिज्जु भाई जी बेहतरीन और उम्दा ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाए.

Comment by umesh katara on April 2, 2015 at 10:07pm

वाह वाह  वाह


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 2, 2015 at 9:16pm

आदरणीय जान गोरखपुरी जी आपका आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 2, 2015 at 7:59pm

आदरणीय सौरभ सर आपका बहुत बहुत शुक्रिया एक दो बार मुझे खटका हुआ था पर लापरवाही से छोड़ कर आगे बढ़ गया था एक बार फिर बहुत बहुत शुक्रिया आपका। जल्दी सुधार करके पोस्ट करता हूँ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 2, 2015 at 6:04pm

भाई शिज्जूजी, क्या कमाल की ग़ज़ल हुई है !

सबा चमन से गुजरते हुएमहक लेकर
रविश-रविश यूँ टहलता ये शह्र छोड़ गई.. . इस मुलायम कहन पर ढेरों दाद लीजिये..

तमाम रात भटकती वो तीरग़ी आखिर
पिघलती शम्अ पिघलता ये शह्र छोड़गई... . आदाब साहब !

रहे हयात में तर्जेहयात देख बदी
हुदूदे डर से निकलता ये शह्र छोड़ गई..  वल्लाह ! (जब मानी मिल गये तो शेर का मेयार समझ में आ रहा है)

इस उम्दा कहन को शेरों में ढालने के लिए बार-बार बधाई..


लेकिन साहब आपने मतले को यों बेपरवाह हुआ क्यों छोड़ दिया ? अब इतने सुधीजनों में से किसी ने इस ओर अगाह नहीं किया है, सो मैं भी भ्रम में आ गया हूँ, कि क्या मैं ही गलत तो नहीं हूँ !  
भाई मेरे यहाँ तो काफ़िया का दोष हो गया है न ! सिनाद दोष इसे नहीं कहते ?
’लता’ के पहले ’बद’ का ’द’ यानी अकारान्त और सानी में ’लता’ के पहले ’खि’ यानी इकारान्त.
भाई, देख लीजियेगा.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 2, 2015 at 5:22pm

आदरणीया महिमाजी नवाज़िशों के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 2, 2015 at 5:21pm

आदरणीय निलेश भैया आपका बहुत बहुत शुक्रिया आप स्वयं एक बहुत अच्छे ग़ज़लकार हैं इसलिये आपकी टिप्पणी मेरे लिये बहुत मायने रखती है 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 2, 2015 at 5:19pm

आदरणीय गिरिराज सर आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 2, 2015 at 5:18pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायण सर आप जैसे वरिष्ठ रचनाकार से रचना की सराहना सदैव हर्ष का कारण होता है आपका तहे दिल से शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 2, 2015 at 5:17pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया

कृपया ध्यान दे...

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