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आसमां को भी कभी सर पर उठाकर देखिये : ग़ज़ल : हरि प्रकाश दुबे

2122--2122--2122--212

इक यही सूरत बची है आज़्मा कर देखिये

दोस्ती अब दुश्मनों से भी निभाकर कर देखिये

 

आँख से रंगीन चश्में को हटाकर देखिये

जिंदगी के रंग थोड़ा पास आकर देखिये

 

रोज खुश रहने में दिल को लुत्फ़ मिलता है मगर

जायका बदले ज़रा सा ग़म भी खाकर देखिये

 

कल बड़ी मासूमियत से आईने ने ये  कहा

हो सके तो आज मुझको मुस्कराकर देखिये

 

छोड़ कर इन ख़ामोशियों को चार दिन तन्हाँ कहीं

आसमां को भी कभी सर पर उठाकर देखिये

 

ख़ुशबुओं के काफिले जायेंगे खुद ही दूर तक

इक जरा सा आप फूलों को हसाँकर देखिये

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित”

Views: 784

Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on March 18, 2015 at 8:39pm

आदरणीय श्याम मठपाल जी , बहुत बहुत धन्यवाद आपका ! सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on March 18, 2015 at 8:38pm

आदरणीय मोहन सेठी जी, ह्रदय से आभार आपका ,सादर !

Comment by Hari Prakash Dubey on March 17, 2015 at 8:19pm

आदरणीय डॉक्टर  विजय शंकर सर, रचना के समर्थन एवं  आपकी उत्साह भरी प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार ! सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on March 17, 2015 at 8:04pm

 आदरणीय धर्मेन्द्र कुमार जी , रचना पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया पर आपका हार्दिक आभार !

Comment by Hari Prakash Dubey on March 17, 2015 at 8:01pm

आदरणीय निर्मल नदीम भाई , आपका हार्दिक  आभार ! सादर 

Comment by Nirmal Nadeem on March 17, 2015 at 3:13pm

behad umda ghazal hui hai janab.

bahut bahut mubarak ho. daad hazir hai.

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on March 17, 2015 at 4:33am

हर शेर उम्दा ....बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है जनाब ...बधाई.... सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on March 16, 2015 at 9:33pm

आदरणीय मिथिलेश भाई , रचना की सराहना करने के लिए आपका बहुत- बहुत  आभार ! सादर

Comment by Hari Prakash Dubey on March 16, 2015 at 8:12pm

आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी ,आपका बहुत बहुत धन्यवाद ! सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on March 16, 2015 at 7:56pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव सर, आपकी सराहना एवं स्नेह से उत्साह बढ़ जाता है ! हार्दिक आभार ! सादर 

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