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हमें इज़ाज़त मिले ज़रा हम नई सदी को निकल रहे है
जवाँ परिंदे उड़ानों की अब, हर इक इबारत बदल रहे हैं।*
गुलाबी सपने उफ़क में कितने मुहब्बतों से बिखर गए है
नया सवेरा अज़ीम करने, किसी के अरमां मचल रहे है।
मिले थे ऐसे वो ज़िन्दगी से, मिले कोई जैसे अजनबी से
हयात से जो मिली है ठोकर जरा - जरा हम संभल रहे है।
अजीब महफ़िल, अजीब आलम, अजीब हस्ती, अजीब मस्ती
किसी के अहसास पल रहे है किसी के ज़ज्बात जल रहे है।
बुजुर्गों अपनी ‘नसल’ पे तुम भी यकीन इतना जुरूर रखना
बड़े अदब से औ एहतियातन जमाना हम तो बदल रहे है।
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(मौलिक व अप्रकाशित) © मिथिलेश वामनकर
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* आदरणीय गिरिराज सर द्वारा सुझाये संशोधन पश्चात् मिसरा.
Comment
आदरणीय मिथिलेश भाई बहुत खूब , शानदार रचना है , हार्दिक बधाई आपको !
अजीब महफ़िल, अजीब आलम, अजीब हस्ती, अजीब मस्ती
किसी के अहसास पल रहे है किसी के ज़ज्बात जल रहे है।....वाह
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