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मैंने ऐसा मंज़र देखा

मैंने ऐसा मंज़र देखा।
बहती आँख समंदर देखा।।

मुझको अपना कहता था जो।
उसके हाथों खंजर देखा।।

मुखड़ा देखा जबसे उनका।
तबसे चाँद न अम्बर देखा।।

शायद कुछ तो दिख ही जाये।
मैंने खुद के अंदर देखा।

दूर दूर तक हरियाली थी।
धरती अब वो बंज़र देखा।।
**********************
राम शिरोमणि पाठक
मौलिक।अप्रकाशित

Views: 814

Comment

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Comment by ram shiromani pathak on December 28, 2014 at 6:45pm
आदरणीय सौरभ जी आपके सुझाव व् अनुमोदन की सदैव प्रतीक्षा रहती है।।बहुत बहुत आभार।।सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 28, 2014 at 3:16pm

भाई राम शिरोमणि, एक सधा हुआ प्रयास हुआ है. उस पर मिले सुझाव भी सार्थक हैं.
इस ग़ज़ल की विशिष्टता इसकी रवानी और सहज ढंग से तथ्य प्रस्तुतीकरण है. यह आपकी शैली के रूप में विकसित हो तो बहुत ही अच्छा हो. कारण, हमने आपकी ऐसी कुछ और प्रस्तुतियाँ भी देखी हैं. यह अवश्य है कि इसके लिए मात्र शाब्दिक होना ही नहीं शब्दों के अक्षर भार के साथ-साथ तथ्य और कथ्य में भी पकड़ बनानी होगी. वैसे आश्वस्त हूँ कि आप ऐसा कर पायेंगे. इस ओर प्रयासरत रहें.  
शुभेच्छाएँ

Comment by ram shiromani pathak on December 28, 2014 at 3:01pm
अनुराग भाई जी अमूल्य सुझाव के लिए बहुत बहुत आभार आपका।।सादर
Comment by ram shiromani pathak on December 28, 2014 at 3:01pm
भाई मिथिलेश जी अमूल्य सुझाव के लिए बहुत बहुत आभार आपका।।सादर
Comment by Anurag Prateek on December 27, 2014 at 9:09pm

दूर दूर तक हरियाली थी।
 उस धरती को बंज़र देखा- ऐसा करने से  लिंग दोष नहीं रहेगा 

वाह ,वाह, दिली दाद कुबूल फरमायें

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 27, 2014 at 9:07pm

बेहतरीन और सही सुझाव अनुराग जी ... केवल  भी के स्थान पर अब कर दे तो उचित रहेगा क्योकि पहले मिसरे में हरियाली थी तो अब बंजर देखा 

दूर दूर तक हरियाली थी।
धरती को अब  बंज़र देखा

Comment by ram shiromani pathak on December 27, 2014 at 8:04pm
भाई शिज्जू जी बहुत बहुत आभार।।सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 27, 2014 at 6:59pm

आदरणीय राम शिरोमणि जी क्या खूूब रवाँ ग़ज़ल कही है आपने वाह, दिली दाद कुबूल फरमायें

Comment by ram shiromani pathak on December 27, 2014 at 3:27pm
श्याम जी बहुत आभार आपका।।सादर
Comment by Shyam Narain Verma on December 27, 2014 at 2:13pm

बहुत लाजवाब, बधाई , सादर ।

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