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गीत: रँग जीवन हैं कितने

*रँग जीवन हैं कितने.

सुख अनंत मन की सीमा में,
दुख के क्षण हैं कितने ?

अभिलाषा आकाश विषद है,
है प्रकाश से भरा गगन.
रोक सकेंगे बादल कितना,
किरणों का अवनि अवतरण.
चपला चीर रही हिय घन का,
तम के घन हैं कितने ?
..दुख के क्षण हैं कितने ?

काल-चक्र चल रहा निरंतर,
निशा-दिवस आते जाते,
बारिश सर्दी गर्मी मौसम,
नव अनुभव हमें दिलाते.
है अमृतमयी पावस फुहार,
जल प्लावन हैं कितने ?
..दुख के क्षण हैं कितने ?

अनजानों की ठोकर सह लें,
क्षम्य नहीं आपस में भूल.
ये मानव रिश्ते भी क्या हैं,
आज फूल कल बनते शूल.
कभी मलय से सौम्य सुगन्धित,
दग्ध अगन हैं कितने ?
.. दुख के क्षण हैं कितने ?

छल फरेब को कैसे मापें,
कौन सान कसें ईमान.
निर्वासित क्यों शौर्य वर्यता,
क्यों कुंठित हो रहे ज्ञान.
आदर्शों की रसवंती में,
कुत्सित्जन हैं कितने ?
..दुख के क्षण हैं कितने ?

स्वर्ग-नर्क सब यहीं धरा पर,
अपने कर्मों की छाया.
सुख-दुख में परिमार्जन करना,
लोभ-मोह मन की माया.
विस्तृत होते इन्द्रधनुष से,
रँग जीवन हैं कितने ?
सुख अनंत मन की सीमा में,
दुख के क्षण हैं कितने ?
**हरिवल्लभ शर्मा

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by harivallabh sharma on November 26, 2014 at 2:47pm

आदरणीय vijay nikore जी हार्दिक आभार रचना के आयामों पर आपका अनुग्रह मिला..बिलम्ब हेतु खेद है ..सादर.

Comment by harivallabh sharma on November 26, 2014 at 2:46pm

आदरणीया MAHIMA SHREE जी हार्दिक आभार आपने रचना पर उत्तम प्रतिक्रिया देकर हौसला बढाया..बिलम्ब हेतु खेद है ..सादर.

Comment by harivallabh sharma on November 26, 2014 at 2:43pm

आदरणीय लक्ष्मण रामानुज लडिवाला जी आपका हार्दिक आभार आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया से सदैव उत्साहित हुआ हूँ..बिलम्ब हेतु खेद...सादर.

Comment by harivallabh sharma on November 26, 2014 at 2:40pm

आदरणीय Dr.Vijai Shanker साहब आपने गीत पर अपनी स्नेहिल उत्साहित करती प्रतिक्रिया दी आपका हार्दिक आभार, बिलम्ब हेतु क्षमा ..सादर.

Comment by harivallabh sharma on November 26, 2014 at 2:38pm

आदरणीय somesh kumar आपकी प्रोत्साहित करती प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार..बिलम्ब हेतु खेद है..सादर.

Comment by harivallabh sharma on November 26, 2014 at 2:36pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी आपकी उत्साहित करती स्नेहिल टीप हेतु हार्दिक आभार...बिलम्ब के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ...सादर.

Comment by harivallabh sharma on November 26, 2014 at 2:33pm

आदरणीय Shyam Narain Verma जी आपकी स्नेहिल टिप्पणी का अति बिलम्बित आभार...

Comment by vijay nikore on October 21, 2014 at 3:01am

आपकी रचना ने चिंतन के लिए बहुत कुछ दिया है। अच्छी रचना के लिए बधाई।

Comment by MAHIMA SHREE on October 19, 2014 at 7:43pm

बहुत ही सुंदर ..हार्दिक बधाई 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 18, 2014 at 10:15pm

बहुत सुंदर भावों के गीत रचना हुई है | मेरी एक पुरानी रचना के कुछ शब्द इस प्रकार थे -

दुख के क्षण बहुत है, सुख भी मिले असीम 

पर सुख तो मृग तृष्णा है दीखे दूरों मील |

सुंदर गीत रचना पर हार्दिक बधाई श्री हरी बल्लभ शर्मा जी 

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